Wednesday, January 27, 2010

क्‍या प्रेस क्‍लब में डीजीपी द्धारा प्रायोजित कार्यक्रम होने लगे हैा




ब्‍लॉग जगत के इतिहास में एक और उपलब्धि जुड् गई 24 जनवरी को छ;ग; के ब्‍लागर प्रेस क्‍लब में इक्‍टठे हुए, मै समझ नहीं पाया की आखिर यहां क्‍या हो रहा हैं, फिर मंरी मुलाकात छ;ग; के पहले ब्‍लागर संजीत भैया से हुईा बैठक के बारे में पुछता रहा की अाखिर इस बैठक का उद्धेश्‍य क्‍या है, प्रेस क्‍लब पर एक पत्रकार साथ्‍ाी ने कहां की, डीजीपी ने तुझे भी खरीद लिया क्‍या मैं तपाक से बोला मैं समझा नही यार, उस पत्रकार साथी ने कहा कि प्रशांत भूषण को जानता है ना, उसने मीडिया को बिकाउ कहां मेधा पाटकर और पांडेजी के साथ आएं थे तब कहां,
डीजीपी ने कहां है कि पत्रकारों को संगठित करके प्रशांत भूष्ण जी जो कि पेशे से वकील है के खिलाफ आंदोलन करे, मैनं कहां तुझे ये सब कैसे मालूम पत्रकार साथी ने कहां कि तुझे याद है पुलिस के खिलाफ ब्‍लाग लिखने पर सम्‍मान किया गया था, तब से खासी पट रहीं है मेरे मित्र का इशारा मेरे ब्‍लागर गुरू अनिल पुसदकर जी की ओर था मैं ये सब बातें नजरअंदाज कर संजीत त्रिपाठी जी के साथ कार्यक्रम में पहुचा, छ;ग; के ब्‍लागर एक छत के नीचे पाकर मैं मन ही मन खुश हुआ कि अलग अलग विचार वाले ब्‍लागर साथ में है, लेकिन सच कहु तो मेरा घ्‍यान बिल्‍कुल नहीं लग रहा था, मैं उठकर आ गया मुझे नहीं मालुम कि वहां क्‍या हो रहा था,
मेरा ध्‍यान मेरे ब्‍लागर गुरू पर लगाए गए आरोप पर था मैं बाहर जाकर कुछ मित्रों से मिला कुछ जानने की कोशिश कि, सभी मित्रों का कहना था पत्रकारिता बिकाउ हो चुकी है , विज्ञापन के कारण खबरें नहीं लगती, फोन आने पर खबरों को रोक दिया जाता हैं हमें समझौता करना पड्ता है वेतन भी सही समय पर नहीं मिलता, और पेपर दो रूपया एक रूपया में बिकता हैं, उसी पेपर को छपने में कितना लगता है तुझे मालुम हैं, मैं भी पेशे से पत्रकार हु पर ये आरोप सुनकर इतना ही बोला कि आपकों किसने कहां है पत्रकारिता करने, नही जमता तों दुसरा कर लो, इस बहस के बीच मैं छोड् कर आ गया
लेकिन इतना जरूर कहना चाहुंगा कि पत्रकारिता को कुछ स्‍वार्थी लोग बेच रहे हैं अनिल पुसदकर जी की पत्रकारिता को करीब से जानते है वो ऐसा कभी नहीं कहेंगे पुलिस परिक्रमा जैसं नियमित स्‍तंभ और विधायको की खरीद फरोख्‍त की ख्रबर या इंदिरा बैंक के घोटालें को उजागर कर आरोपी को जेल तक पहुचाने वाले ऐसे पत्रकार पर आरोप लगाकर पता नहीं, ऐसे तथाकथित पत्रकार अपनी पत्रकारिता को किस उंचाई तक पहुंचा रहे है या हो सकता है कि आज के पत्रकार खोजबीन करने में लगे है जो बार बार यही प्रश्‍न पूछते नजर आते है कि हमें प्रेस क्‍लब की सदस्‍यता क्‍यों नहीं मिल रहीं, और क्‍यों अध्‍यक्ष चुनाव नहीं हो रहा हैं बहस के बीच मुद्धा यहीं हैं कि
क्‍या प्रेस क्‍लब में डीजीपी द्धारा प्रायोजित कार्यक्रम होने लगे हैा

Wednesday, July 22, 2009

सत्‍यमेव जयते मे अश्‍लीलता की छवि

स्‍टार टीवी पर हाल ही में प्रसारित किए जा रहे रिएलिटी शो सच का सामना नेताओं के लिए मुसीबत बनी हुई है उन्‍हे लगने लगा है कि जनता कही उन्‍हे ही इस सच पकडने वाली मशीन पर बिठाने का तो मन नही बना रही है पिछले साठ सालों की राजनीति में सरकार और राजनेता जिस सच और न्‍याय के लिए वोट मागते आए है , वही उन्‍हे सच वाले कार्यक्रम पर आपत्ति होने लगी है इस बार का बहाना है रियालिटी शो मे सच के नाम पर अश्‍लीलता परोसे जाने का आरोप,

कभी सोचा ही नही जा सकता कि सच्‍चई लोगो को खासकर राजनेताओं को चुभने लगी है भारत देश मे जहां बहुत से देवी देवताओं के मंदिरो् में कामसुत्र और ना जाने कैसे कैसे आसन जिसका जिक्र ना तो पुस्‍तको मे है और ना ही वेदो में कुछ आसन जरूर समझ में आते है लेकिन इन आसनो का उदेश्‍य और हिन्‍दु रितीरिवाजो के इस मंदिर में अश्‍लीलत क्‍यो फैला रहे है कौन है इस धर्म के ठेकेदार और क्‍यू हिन्‍दू धर्म को अश्‍लीलता के दायरे में खडा कर रहे है

ये सवाल उन राजनेताओं के लिए है जो सांसद में फालतू के प्रश्‍नों को उठाते है जबकि छ;ग; मे नक्‍सलवाद समस्‍या सहित पूरे देश में मंहगाई इस कदर बड चुकी है कि लोग अपने लिए भोजन की व्‍यवस्‍था नही कर पा रहे है और इन राजनेताओं को भारत की संस्‍क़ति और समाज के लिए क्‍या देखना चाहिए और क्‍या नही देखना चाहिए इसकी चिंताएं ज्‍यादा सताने लगी है जो सच जैसे कार्यक्रम को प्रसारित करने को लेकर सेंसरशिप लगाने की बात कह रहे है , सच कडवा होता है सुना और देखा भी था लेकिन सत्‍यमेव जयते कि शुरूआत संसद के हंगामे और अश्‍लीलता के उदाहरणों के साथ हो रही है

Monday, July 20, 2009

ऐसी पत्रकारिता को सभी सलाम करते है


मीडया एक बडा व्‍यापार बना हुआ है मिडिया आवाज उठाने नही बेईमानो के पैसे दो गुणे करने मे व्‍यस्‍त है बहुत कम लोगो को इस बात की जानकारी है कि पत्रकार की औकात सिर्फ जी हुजूरी से बढकर कुछ भी नही,एक पत्रकार लंच बाक्‍स रख्‍ाने की औकात भी नही रखता प्रेस क्‍लब मे मिलने वाले नाश्‍ते से और दोपहर के किसी होटल मे प्रेस से मिलिए के बहाने दिन भर व्‍यस्‍त रहता है कुछेक प्रमुख चैनलों की छोडे तो सभी टीवी स्ट्रिंगर अपनी स्‍टोरी के साथ समझौता करते है क्‍यों कि महिने के मात्र बारह तेरह हजार उसमें भी पेट्रोल और मोबाईल के खर्चे का कोई हिसाब नही होता कुल मिलाकर महिने ख्‍ात्‍म होते और शुरू होते पांच हजार बचते है, ऐसे संवाददाता दुसरो को न्‍याय दिलाने के लिए जी तोड मेहनत भी करते है मगर अपनी जरूरतों के आगे सब कुछ छोडकर मुकदर्शक बन जाते है
ऐसे कथित रूप से पत्रकार कभी अपनी जरूरतों को पूरा ही नही कर सकते इनकी
मजबुरीयां इस हद तक बन चुकी है कि अपनी इंकम तक की मांग करने से कतराते है दुसरे मीडिया संस्‍थान में नौकरी तक के लिए तरस जाते है बतौर मार्केटिंग के किसी संवाददाता को महत्‍तव भी नही दिया जाता, कुछ करने और ना करने की जिद से पत्रकार दलाल से कम नही हो जाता , नंगी आंखो से देख्‍ाने पर पता चलता है कि मीडिया संस्‍थान राजनीतिक पार्टियों के हस्‍तक्षेप से चलाए जाते है जिसका सीधा वास्‍ता वोट बैंक से जुडकर सामने आता है मीडिया कुल मिलाकर लोगों को गुमराह करने का कार्य कर रही है इसका सबसे बडा उदाहरण है मीडिया के आय के स्‍त्रोत के रूप में सिर्फ विज्ञापन पर निर्भर होना , और विज्ञापन उत्‍पाद के प्रचार से मिलते है और कुछ स्‍पेशल स्‍टोरी के स्‍पेशल पैकेज चलाने के ,,,
लोगो मे यह गलत धारणा बन चुकी है कि मीडिया एक बहुत बडी ताकत है और इसे लोकतंत्र के चौथे स्‍तम्‍भ तक की संज्ञा देने से नही चुकते , मुझे यह समझ नही आया कि जब लोकतंत्र के तीनों स्‍तम्‍भ में घुन लग चुके है तो फिर चौथा स्‍तम्‍भ क्‍यों और कैसे बच सकता है भारत मे इले़ मीडिया का इतिहास और समाचार पत्रों के इतिहास में एक पीढी का अंतर है इस मीडिया के फेर मे लोग फसकर ग्‍लैमर के चक्‍कर मे मीडिया जैसे
क्षेत्र को चुन चुके है जिनमें मै भी एक हूॅ इससे अच्‍छा होता कि मै अपने गांव के किसी खेत मे हल चला रहा होता और ऐसी मीडिया के आगे सलाम तो नही करता जिसे सभी लोग एक सत्‍य मानकर सलाम करते है शायद और भी लोग बचे है जो पत्रकारिता को सलाम करते है,,,,,,,,,,,,
एक पत्रकार की तन्‍खवाह और लंच बाक्‍स सब बयां करती है

Monday, May 11, 2009

छ.ग. में उद्धेश्‍य और वादो के बीच जवानो की मौत

सलवा जुडूम और नक्‍सली मुठभेड ये दोनो बाते भारत के हर नागरिक जानते है खासकर छत्‍तीसगढ की पहचान ही नक्‍सली मुठभेड बन चुकी है सऩ 2005 से सलवा जुडूम की शुरूवात से आज तक पुमिस और नक्‍सलीयों म़तको की संखया 2005 से ज्‍यादा पहुंच चुकी है लगातार हो रहे हमले में कभी कुछ हासिल हुई हो तो वह है मौत
लगातार हमले से सरकार ने यहां तक कह दिया कि हम आर पार की लडाई लडेंगे मगर कैसे यह नही बताया नक्‍सलियों ने सोचा ही नही और आर पार की लडाई शुरू कर दी लगातार एक के बाद एक हमले रोज हो रहे है भला हमले से किसे क्‍या मिल गया और इसका अंत कितने सालों में होगा ये ना तो मंत्री जी जानते है और ना ही नक्‍सलियों को मालूम
सलवा जुडूम की स्‍थापना से लेकर आज तक का समय देख लिया लेकिन छत्‍तीसगढ के ही निवासियों को समझ नही आया कि नक्‍सलियों की मांग क्‍या है उद्देश्‍य क्‍या है, मंत्रीजी भी योजनाएं बनाने और योजनाओं की प्राथमिकताओं को पूरा करने का दम भरते है अगर आदिवासी क्षेत्र में योजनाएं पूरी हुई तो हत्‍याएं क्‍यों , और नही हुई तो सरकार क्‍या कर रही है , छ.ग. सरकार इस बार नक्‍सलियों को ललकार चुकी है आर पार की लडाई लडने की बात कहकर पीछे भी हट गई इसमे सरकार को अगर कहे कि वह अपने उद्धेश्‍य से भटक चुकी है और नक्‍सलियों को पहले मारने के लिए उकसा रही है तो कोई गलत नही है,,,
मुझे अपने दोस्‍तो से मिलने के लिए उनकी मौत का इंतजार करना पडता है मै तो पुलिस नही बन पाया लेकिन पुलिस भर्ती में बहुत सारे दोस्‍त बने थे जो धीरे धीरे दूर होते जा रहे है मैने अभी तक साथ के तीन दोस्‍त खोएं है और एक दोस्‍त अभी भी नक्‍सलियों से लडाई करने में व्‍यस्‍त है लगता है उसकी मौत का इंतजार करना होगा मुझे, क्‍यो कि सरकार के फरमान से आगे तक नक्‍सली खत्‍म नही होंगेा रोज दर्जनो लाशे घर पहुंचाई जा रही है कोई तो अपना उद्धेश्‍य बताएं जिससे मेरे दोस्‍तो की मौत रूक सकें, उद्धेश्‍य और वादो के बीच जवानों की मौत का जिम्‍मेदार सिर्फ सरकार ही है यह फैसला सच हो सकता है ,,,,

Monday, April 13, 2009

छत्‍तीसगढ़ में मतदान तक होगा भाजपा का प्रचार इसमें सभी का होगा साथ।

योग से निरोग का रास्‍ता दिखाने वाले योगगुरू बाबा रामदेव देश में स्‍वाभिमान ट्रस्‍ट के जरिए स्‍वाभिमान रैली कर जनता को जागरूक करना चाहते हैं। इसका दूसरा पहलू लोकतंत्र में राजनीति का राज है। बाबा रामदेव और ज़ी छत्‍तीसगढ़ साथ मिलकर जनता को जागरूक करने के साथ-साथ अप्रत्‍यक्ष रूप से भारतीय जनता पार्टी को ही सपोर्ट कर रहे हैं जिससे लालकृष्‍ण आडवानी प्रधानमंत्री बनेंगे। आडवानी के प्रधानमंत्री पद से जी न्‍यूज छततीसगढ़ और बाबा रामदेव का स्‍वार्थ तो पता नही चलता लेकिन इतना जरूर है कि आचार संहिता के बावजूद अगर बाबा रामदेव मतदान के पहले और मतदान तक अपने कार्यकर्ताओं को प्रेरित करेंगे कि मतदान हो , मतदान होना या ना होना राजनीति के साथ राष्‍ट्रीय मुदृा भी है लेकिन भाजपा के घोषणापत्र और गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के बयान की स्विस बैंकों से पैसा वापस लाया जाए। ज़रूर राजनीतिकरण है जिसका साथ देने के लिए उत्‍सुक नज़र आ रहे हैं बाबारामदेव जी।

विपक्ष के नेता रहे लालकृष्‍ण आडवानी भले ही 5 साल विपक्ष की भूमिका में रहे हैं, लेकिन एक विपक्षी जैसा प्रहार किया की नहीं ये भी एक स्‍वार्थ हो सकता है। स्विस बैंक में 71 हज़ार लाख करोड़ रूपए कतिथ रूप से काले धन के रूप में जमा है। ये काला धन राजनीतिक मुदृा बन गया है भाजपा से किस टीवी चैनल से स्‍वार्थ और किस महात्‍मा को फायदा होना है। इसका तो पता नहीं, लेकिन चुनाव आयोग को ज़रूर ऐसे आयोजन और चैनलों के प्रसारण पर रोक लगा देनी चाहिए। जो कि चुनाव के दौरान निष्‍पक्ष होने के बजाय राजनीतिक पार्टी के पक्ष में प्रचार करे।
स्‍वयं बाबा रामदेव कहते हैं कि राजनीतिक दलों को स्‍पष्‍ट चुनौती है। जो भी पार्टी विदेशों से काले धन को लाने में सहमत होगा। उस पार्टी के लिए वे प्रचार करने को तैयार हैं। स्‍वामी जी ने एकाएक पलटकर यहां तक कह दिया कि ये मुदृा भारतीय जनता पार्टी का नहीं, बल्कि भारतीय जनता का है। तो फिर पार्टी का क्‍या है।
इतना सुनने के बाद तो चुनाव आयोग को समझ ही जाना चाहिए कि स्‍वामी जी पार्टी का समर्थन करने के लिए तैयार हैं या तैयार होकर आ चुके हैं। अब चुनाव जनता ही करे, कि जब राजनेता, पत्रकार और योगगुरू, किसी पार्टी विशेष के लिए एक ही सुर में बोले, तो ये लोकतंत्र होगा या राजतंत्र।

Friday, April 10, 2009

आदमी क्‍या है एक जोडी जूता है़

आदमी क्‍या है एक जोडी जूता है़
कोई आदमी जूते की नाप से बाहर नही है
जूते मारने के सिलसिले की शुरूआत भी यही से होती है
चाहे वो राष्‍ट्रपति हो या गली का बच्‍चा, जूते की मार पड ही रही है
ये जूता आदमी के नाप का ही है
जिसे जूते नही पडे शायद उसे अपने जूते के नाप का अंदाजा नही है
जूता मार प्रतियोगिता की शुरूआत भले ही एक पत्रकार (मुंतजर अल जैदी्)ने की हो
लेकिन मेरे मोहल्‍ले मे छुटभैय्ये नेता हमेशा एक नारा लगाया करते थे
कि ------------------ के दलालो को जूते मारो सालों को
कही ये नारा समझने के साथ्‍ा अभ्‍यास मे तो नही हो रहा है
अब तो अच्‍छी क्‍वालिटी के जूते पहनने पडेंगे क्‍या पता कल,,,,,,,
मै तो नही मारूंगा लेकिन मेरे जूते से कोई मारे और टी वी वाले उस जूते को दिनभ्‍ार दिखाएंगे
और विज्ञापन वालो से कमाई भी होगी इसमे आपका क्‍या इरादा है

Tuesday, February 17, 2009

जांजगीर संसदीय क्षेत्र प्रदेश्‍ मे नंबर वन पर है

लम्‍बे समय से आराक्षण्‍ के आग मे सभी जल गए जिसमे प्रमुख्‍ रहा राजनीति मे आरक्ष्‍ण्‍ का ,1947 से आरक्ष्ति सीटो पर आरक्षित वर्गेां का कब्‍जा रहा लेकिन क्‍या आरक्षित वर्गों का भला हो पाया और क्‍या राजनेता आरक्षित वर्ग का भला करने मे सक्षम है लम्‍बे दौर से आरक्षण केवल नीची जाति वर्ग के लोगों के लिए ही है जो आज तक चले आ रही है। ये भारत मे वर्ग विशेष की दबाव नीति से निचे वर्ग खासकर अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति को आरक्षण है आजादी के बाद भी शिक्षा,राजनिती, व्‍यवसाय और कई स्‍थानों पर आरक्षण का मिलना एक अलग तरह के भेदभाव को जन्‍म देता है, खासकर ऐसा वर्ग जो आज तक अपनी उपस्थ्‍िति समाज मे सभ्‍य मानसिकता के तौर पर बना नही पाएं , लेकिन सोचने वाली बात ये है कि अपने आरक्षित क्षेत्र से राजनेता भी गएं और आरक्षण बना भी रहा पर भेदभाव खत्‍म क्‍यो खत्‍म नही हुआ। क्‍यो आख्रिर आरक्षण की जरूरत राजनेताओं को पड रही है
लोकसभा चुनाव और गर्मी महीना अपने उम्‍म्‍ीदवारों के चयन मे ही राजनीतिक पार्टियां सिमट कर रह जाएंगी सबसे पहले तो भेदभाव ही ये प्रत्‍याशी और प्रतिनिधि बनाते है। अगर बात करे छत्‍तीसगढ् प्रदेश्‍ की तो हाल ही मे सम्‍पन्‍न हुए विधानसभा चुनाव में रायपुर के ऐसे प्रत्‍याशी (नंदे साहू ) जो लम्‍बे से राजनीति में सक्रिय नही रहें, जितना कि विपक्षी पार्टी के प्रत्‍याशी (सत्‍यनारायण्‍ शर्मा) सक्रिय रहे और प्रदेश कांग्रेस कमेटी में कार्यकारी अध्‍यक्ष पद पर रहे । रायपुर राजधानी में भी साहूवाद जातिवाद हावी रहा है, जिसके कारण्‍ नंदे साहू जीते और विधानसभा भी गए । साहू जी की जीत जातिगत समीकरण्‍ और भेदभाव को बढावा देने की बात करे तों शायद कुछ गलत नही ।
अब फिर एक बार जातिगत समीकरनों की चर्चा है जो कि लोकसभा प्रत्‍याशी चयन के लिए आवश्‍यक मान ली गई है। छत्‍तीसगढ् मे 11 लोकसभा सीट के लिए मात्र जांजगीर संसदीय क्षेत्र ही अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित है जिसमें सर्वाधिक 42 उम्‍मीदवार की कतार है जो अपनी-अपनी दावेदारी पेश्‍ कर रहे है अनुसूचित जाति वर्ग के प्रदेश भर के उम्‍मीदवार अपनी सीट पक्‍की मान रहे है लेकिन जातिगत समीकरण पर कोई प्रत्‍याशी बात करते ही नही । बडे-बडे दिग्‍गज नेता जो अनुसूचित जाति वर्ग के है वे सभी आरक्षित सीट से ही लडने की मंशा जता रहे है और अगर जीत भी गए तो ना ही संसदीय क्षेत्र का भला होगा और ना ही अनुसूचित जाति वर्गो का, कुछ महत्‍तवपूर्ण बिन्‍दुओ पर चर्चा करे तो- नकल प्रकरण मे जांजगीर संसदीय क्षेत्र प्रदेश्‍ मे नंबर वन पर है ,, अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति वर्ग के बावजूद रोजगार में पीछे है। ,, शिक्षा में यहां के निवासी बिलासपुर और रायपुर पर निर्भर है
जांजगीर संसदीय क्षेत्र के लिए 42 उम्‍मीदवार ,क्षेत्र का विकास और आरक्षित वगौ्ं की होड ,मतदाताओं के लिए सोचनीय विषय हो सकती है अगर मतदाता जागरूक हो तो

Tuesday, February 3, 2009

ऑस्‍कर के लिए अक्‍सर मे ना बदल जाएं

स्‍लमडॉग मिलेनियर जो भारत मे देर से रिलीज हुई अगर आस्‍कर तक नही पहूंचती तो शायद भारत मे भी रिलीज नही होती जो कि भारत देश मे मायानगरी मुंबई की सच्‍चाई पर बनी है मुंबई की गलियों से सच्‍चाई बयां करती ये फिलम सभी प्रदेशों की कहानी भी हो सकती है भीख मांगने से पहले की सच्‍चाई बयां करना से लेकर करोड्पति बनना और बाल विकास विभाग की ओर से तारीफ करना कि वास्‍तविक से रूबरू कराने वाली फिल्‍म को ऑस्‍कर मिलना चाहिए
ऑस्‍कर मिले या ना मिले लेकिन सामाजिक संस्‍था और सरकार के बचपन को लेकर ऐसे अनेक वादे हुए है तारे जमीं पर उतारे गए और एक नौजवान करोडपति भी बना फिर भी भारत देश की दशा नही सुध्‍ारी दिखीा दिशा सुधारने की बात ही छोडिएंा मधुर भंडारकर असलियत को पर्दे पर उतारने मे माहिर माने जाते है जो ट्रेफिक सिग्‍नल मे दिख भी, वही आमिर खान गिने चुने फिल्‍मों मे अपनी अदाकारी की छाप छोडते है ये सारे मशहूर हस्‍तियां जिसके सामने ये विषय कोई समस्‍या ना होकर पैसा बनाने की मशीन है फिर भी वास्‍तविक्‍ता यही है आज भी लोग भूखे नंगेऔर सडक पर सोने को मजबूर है शायद इनको ऑस्‍कर मिलता तो अमीरी गरीबी का भेदभाव कम होता लेकिन अक्‍सर ऐसा नही होगा मेरे देश मे गरीब गरीब ही रहे तो ठीक है आदिवासी छोटे कपडे पहने तो ठीक, कबिलों देहात गांवो में कोई महिला अर्दनग्‍न दिख्‍ो तो ठीक है क्‍यों कि पैसा बनाते है अगर गरीबी खत्‍म हो गई तो पैसा कमाने का नया आयडिया कहां से आएंगे
स्‍लमडॉग मिलेनियर को ऑस्‍कर एवार्ड मिलने या ना मिलने के पीछे एक बात जरूर सोचनीय है कि अगर ये एवार्ड एक ऐसी फिल्‍म को मिलती जिससे कि जाति, धर्म, छुआछुत रंगभेद सब मिट जाएं तो शायद हमारे महापुरूषों और अनगित देशवासियों पर भारतीय होने का गर्व सौगुणा और बढ जाएगां ,, स्‍लमडॉग मिलेनियर फिलम का 11 नामांकन होना अवार्ड मिलने की उम्‍मीद तो बढाती है लेकिन आजादी के इकसठ् साल बाद भी ऐसे हालातों पर तरस आनी चाहीएं कि रेल्‍वे स्‍टेशन पर क्‍यों भीख दिया जाएं, उस बच्‍चे को भीख्‍ा की बजाय अधिकारों के बारे में क्‍यों नही बताया जाएं, क्‍यो ना हर व्‍यक्ति अपने अधिकारों का ख्‍याल रखकर जिला अधिकारी से सवाल करे की बच्‍चे आखिर ऐसा क्‍यो कर रहे है कौन मजबूर कर रहा है इन्‍हे अपना बचपन बर्बाद करने के लिएा
ऑस्‍कर नामांकित स्‍लमडॉग मिलेनियर को मेरी अग्रिम शुभकामनाएं

Sunday, February 1, 2009

क्‍या होगा हम हिन्‍दुओं का.....।

बसंत पंचमी पर्व भारत में अपना विशेष महत्‍व रखता है। क्‍योंकि इसी दिन से बसंत रितु की शुरूआत होती है। लंबे समय से ज्ञान की देवी सरस्‍वती मां की पूजा-अर्चना की जाती रही है, जो आज भी चल रही है। जो कि स्‍कूलों-कॉलेजों में बड़े रूप में मनाए जाते हैं। हिन्‍दू धर्म में सरस्‍वती माता को ज्ञान की देवी भी कहा जाता है। हिन्‍दू होने के नाते मुझे गर्व होने के बजाय ये सवाल मन में है कि आखिर हिन्‍दू देवी-देवताओं का सम्‍मान कहां पर हो रहा है।
मेरे मोहल्‍ले और कॉलेज में अण्‍डा पेड़ लगाकर पूजा-अर्चना शुरू की गई और तरह-तरह के कार्यक्रमों से दिन को यादगार बनाने की कोशिश भी की गई। हिन्‍दू धर्म के अनुसार ज्ञान की देवी माता सरस्‍वती है। लेकिन क्‍या दूसरे धर्म के लोग भी माता सरस्‍वती को ज्ञान की देवी मानते हैं। मेरे इस प्रश्‍न से अच्‍छे-अच्‍छे विचारों पर विराम लग सकता है। क्‍योंकि अगर सभी धर्म के लोग सरस्‍वती माता को ज्ञान की देवी नहीं मानते। तो फिर मेरे धर्म के लोग सरस्‍वती माता का अपमान खुशी से क्‍यों स्‍वीकार कर रहे हैं। इस मान, सम्‍मान और अपमान की बात के बीच सार्वजनिक जगहों पर पत्‍थर रखकर सिंदूर लगाकर पूजना और फिर देवी-देवताओं को मंदिर के बजाय रोड, गंदगी या फिर किसी भी सार्वजनिक स्‍थानों पर पूजना क्‍या हिन्‍दू धर्म के संस्‍कार हैं। अगर नहीं तो क्‍यों ऐसे काम हिन्‍दुवादी विचारधारा वाले कर रहे हैं। क्‍या सिर्फ पूजा-पाठ, यज्ञ करने से ही धर्म की सर्वोच्‍च्‍ाता बढ़ती है।
मेरे विश्‍वविद्यालय में बसंत पंचमी पर सरस्‍वती पूजा और हवन कार्यक्रम आयोजित की गई और सभी छात्रों ने हिस्‍सेदारी भी निभाई, सिवाय मेरे........... । मेरे पूजा-पाठ में शामिल नहीं होने पर मेरे मित्र तरह-तरह की धारणाएं बनाने लगे। कुछ मित्रों ने मुझे कहा कि क्‍यों हिन्‍दू धर्म में रहने का इरादा नहीं है क्‍या पापी। तो कुछ छात्रों ने आतंकवादी कहकर संबोधित किया। पत्रकारिता के छात्रों के इस कृत्‍य पर हंसी तो आई लेकिन बसंत पंचमी की‍फिकर करके मैं चुप हो गया। कुछ अन्‍य धर्म के मित्र मेरे साथ लाइब्रेरी में बैठे बोलने लगे कि अरे यार तेरे धर्म में देवी-देवताओं को सार्वजनिक जगह में पूजने का क्‍या अर्थ, इनका स्‍थान तो मंदिर में होना चाहिए। कुछ देर तक मैं चुप बैठा लेकिन वास्‍तव में मुझे अपने धर्म में रहकर अपने ही हिन्‍दू धर्म के लोगों पर गुस्‍सा भी आया। चूंकि हिन्‍दू धर्म पहले से ही वर्ण-व्‍यवस्‍था से घिरी हुई है, जिसमें शुद्रों की स्थिति दयनीय है। हिन्‍दू धर्म में ब्राह्मण वर्ग का श्रेष्‍ठ होना और धर्म को बदनाम करने की साजिश क्‍या वास्‍तव में उच्‍च वर्णों के हाथ में है।
ब्राह्मणवाद को लेकर मुझे कोई शिकायत नहीं है। शिकायत तो मुझे हिन्‍दू देवी-देवताओं का सार्वजनिक जगहों में पूजने पर है। हिन्‍दू धर्म के अलावा किसी भी धर्म के लोग अपने ईश्‍वर के साथ इतनी ज्‍यादती नहीं करते सिवाय हिन्‍दू धर्म के। मार्क्‍स के विचार कि राष्‍ट्र के विकास में धर्म अफीम है। इसके बावजूद भी क्‍या देश में हिन्‍दू देवी-देवताओं का और हिन्‍दू धर्म का हित हो पाएगा।

Monday, January 26, 2009

पूर्ण्‍अपमान दिवस

26 जनवरी एक ऐसा पर्व जिसका इंतजार हर देशवासियों और खासकर देशभक्‍तों को आस रहती है मेरी प़त्रकारिता और कुछ अलग करने की उम्‍मीद ने मुझे एक बार फिर अपने अपने अस्तित्‍व की ओर झाकने को मजबूर किया है उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त मेरी शिक्षा देश के काम नही आई. शिक्षा का महत्‍तव बताने वाले शिक्ष्‍ाक मुकदर्शक बन सभी आयोजनो का मजा लेते रहेा पता नही चला की 26 जनवरी की सुबह देश के महत्‍तव को जानने के लिए था या संविधान के अनुसार अपने कार्य को अपनी जिम्‍मेदारी के साथ पूर्ण करने का

गली मोहल्‍ले मे तिरंगा फ‍हराने का इंतजार करते लोग और खुशी के बीच मेरी चुप्‍पी ना जाने क्‍यों मन ही मन चुभ रही थी तिरंगे के नीचे महापुरूषों की दुर्दशा अपने अपमान से कम नही इन सब मे भी चौकाने वाली बात रही गांधीमय ध्‍वजारोहण मै मेरी भावनाओं के साथ या किसी की भावनाओं के साथ खिलवाड करना नही चाहता लेकिन मेरी बेबाकी जायज है क्‍यों कि संविधान के निर्माता डा; भीमराव अम्‍बेडकर फिर अछूते दिखें ृृृृृ आजादी से पूर्व अपने आजादी की परवाह किए बिना अछूतों के हक की लडाई लडने वाले मेरे आदर्श महापुरूष को उन्‍ही लोगो ने अछूत बना दिया जो गर्व से इस महापुरूष के च्रयास से उच्‍च पदो पर आसीन है। गली मोहल्‍ले कालोनी मे तो गांधी मगर मेरे देश में क्‍या बाबा साहब के लिए नही है. मै हमेशा तो ऐसी मांगे नही करता लेकिन क्‍या बाबा साहेब को पूजा जाना या उनके कार्यों की बखान करना अछूतों की श्रेणी मे खडा करता है मुझे मेरी जिम्‍मेदारीयों का एहसास भी है फिर भी मै कुछ नही कर सकता

मै दावा के साथ कह सकता हू की मेरे देश मे छूआछूत खत्‍म नही हुआ है और छूआछूत खत्‍म करना कोई नही चाहता क्‍यो की मान-सम्‍मान और प्रतिष्‍ठा इसी सें बनी रहती है इन सबके बावजूद कोई संविधान के बारे मे कुछ बताना नही चाहता और क्‍यो बताएं अगर आम लोगो को अपने अधिकारों की जानकारी हो गई और जाग गए तों देश में भ्रष्‍ट मंत्री अधिकारी आई एस कुलपति नही बनेंगे लेकिन कुछ स्‍वार्थ के लिए महापुरूषो का अपमान हुआ है खासकर एससी एसटी और ओबीसी वर्ग के उच्‍च पदस्‍थ लोगो को शर्म आनी चाहिए जो इन महापरूषों के सम्‍मान के लायक नही है।

Friday, January 9, 2009

शिक्षा के क्षेत्र में जातिवाद हावी

भारत को लोकतांत्रिक देश की संज्ञा दी गई है लेकिन लोगों का जीवन लोकतांत्रि‍क देश के अनुकूल नही है यहां हर क्षेत्र में समस्‍या ही समस्‍या है लोगों की समस्‍या के समाधान करने वाले को दबा दिया जाता है और न्‍याय संगत बाते करने पर आरोप जड़ दिए जाते हैं। ये किसी किताब से पढ़ा हुआ नही है और ना ही किसी के द्वारा बताया गया हैं। ऐसे हालात मुझ पर ही बन चुके हैं या कहे शिक्षा व्‍यवस्‍था पर वर्ग विशेष्‍ा का दबाव है कुशाभाउ ठाकरे पत्रकार‍िता एवं जनसंचार विश्‍वविघालय अपने लक्ष्‍य से भटक चुका है पत्रकारिता की शिक्षा देने के बजाय (ब्राम्‍हण) वर्ग विशेष को अच्‍छे नम्‍बर दिए जाते है मेरा मक्‍सद हिन्‍दू र्म की बुराई करना तो नहीं, लेकिन बेबाक बोलना मेरी बुराई है ये सभी शिक्षक कहते है सेमेस्‍टर की पढाई परीक्षा का परिणाम आ चुका है जिसका कोई औचित्‍य नही है पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष भी अधिकतर छात्र-छात्राएं परीक्षा परिणाम को लेकर असंतुष्‍ट हैं। वहीं इस वर्ष चौंकाने वाले परिणाम सामने आए हैं। उत्‍तीर्ण परीक्षार्थियों की संख्‍या 76.92 प्रतिशत रही और अधिकतर छात्रों को पूरक दे दिया गया। लेकिन इन सबमें भी चौकाने वाली बात रही। इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया के छात्र जीतेन्‍द्र सोनकर को एक विषय में पूरक दे दिया गया। जोकि निजी टीवी चैनल में संबंधित विषय के अंतर्गत कार्यरत् हैं। जिस विषय में पूरक दिया गया वो है एडिटिंग ग्राफिक्‍स। जिसे बतौर नॉन लीनियर एडिटर की मुख्‍य भूमिका में 3 साल का अनुभव है। मीडिया क्षेत्र में अनुभव प्राप्‍त छात्र को पूरक देना विश्‍वविद्यालय के लिए एक शर्मनाक बात है और जाहिर है कि परीक्षा परिणाम में त्रुटियां पाई गई है। इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया के विभागाध्‍यक्ष से इस विषय पर बात करने पर आश्‍वासन के सिवाय कुछ न्‍याय संगत बातें नहीं मिली।
विभिन्‍न विषयों के परिणामों को देखें तो चौकाने वाले परिणाम आते हैं जिसमें लगातार 2 सेमेस्‍टर से प्रथम श्रेणी पर उत्‍तीर्ण छात्र को इस बार सेकेण्‍ड दर्जा दिया है। वहीं एम.जे. के छात्र में भी काफी फेरबदल हुए हैं। कुल मिलाकर सभी विषयों में विशेष वर्ग को महत्‍व दिया गया है। जितने भी छात्र पहले पायदान पर पहुंचे हैं वे सभी ऊंची जाति के हैं। जिनमें अधिकतर शर्मा, मिश्रा, शुक्‍ला जैसे उपनाम वाले छात्र हैं। वहीं पिछले सेमेस्‍टर के परिणाम में जाति विशेष को दर्जा नहीं दिया गया था। इस सेमेस्‍टर के उत्‍तीर्ण छात्र जो कि अच्‍छे नंबरों से अच्‍छे पायदान पर पहुंच चुके हैं। उन छात्रों को अच्‍छे पायदान पर पहुंचने का अंदाजा तो दूर पूरक आने तक का डर था। उसी डर ने इस तरह की जातिगत नंबरों को महत्‍व देने के आधार पर विश्‍वविद्यालय पर प्रश्‍न चिन्‍ह लगा दिया है।
असंतुष्‍टों की श्रेणी में ब्राह्मण वर्ग को छोड़ सभी निम्‍न वर्ग की श्रेणी में आते हैं। एस.टी.,एस.सी. और ओबीसी छात्र-छात्राओं का गुस्‍सा फूट रहा है। वाकई अगर हालात ऐसे ही बने तो वो दिन दूर नहीं जब हिन्‍दू खुद आपस में वर्ग विशेष के लिए न्‍याय पाने हिंसात्‍मक कदम उठा लेंगे। विश्‍वविद्यालय में बहुत सारी गतिविधियां ऐसी होती है जो कि जाति के आधार पर जाति में खुद को ऊंचे पायदान पर पहुंचाने की कोशिश रहती है। मेरा मकसद न ही जातिगत भावनाओं में फूट डालना है और न ही जाति के आधार पर भेदभाव करना है। लेकिन अगर बात शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र की हो तो शिक्षा अधिकारी को चुप नहीं बैठना चाहिए क्‍योंकि राष्‍ट्रभक्ति में शिक्षा का महत्‍वपूर्ण योगदान होता है। मेरा स्‍वयं पूरक आना पता नहीं मेरी पत्रकारिता में कितने आड़े आती है, लेकिन मैं उन पत्रकारों में से नहीं हूं जो प्रथम श्रेणी के आधार पर पत्रकार बनते हैं। अनगिनत लेखकों एवं विद्वानों के मदद से मैं अपनी बेबाकी को समय आने पर ज़रूर प्रस्‍तुत करूंगा।

Wednesday, January 7, 2009

ताराचंद छत्‍तीसगढिया बनाम प्रेमप्रकाश बिहारी

छत्‍तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में भाजपा के दिग्‍गजों की हार से आलाकमान को कार्यवाही करने के लिए मजबूर होना पड़ा। भिलाई विधानसभा से पूर्व विधानसभा अध्‍यक्ष प्रेमप्रकाश पाण्‍डे को हराने के लिए भाजपा सांसद ताराचंद साहू पर कार्यवाही कर उन्‍हें पार्टी से निष्‍कासित कर दिया गया। पार्टी से निष्‍कासित होने के बाद भाजपा सांसद ताराचंद साहू के तेवर नरम नहीं पड़े बल्कि और ज्‍यादा गर्म हो गए हैं। जो बात भिलाई तक सीमित थी। अब निष्‍कासन के पश्‍चात पूरे प्रदेश में फैल गई कि छत्‍तीसगढि़यों की अस्मिता को समझने के लिए छत्‍तीसगढ़ में छत्‍तीसगढ़ी प्रत्‍या‍शी और जनता का प्रिय होना ज़रूरी है।

मुद्दा वही पुराना है। जब महाराष्‍ट्र में बिहारियों पर लाठी बरस रहे थे। तो वहीं छत्‍तीसगढ़ में भी अस्मिता के लिए सांसद ताराचंद साहू और उनके समर्थकों ने भिलाई के बिहारी नेता (पूर्व विधानसभा अध्‍यक्ष) प्रेमप्रकाश पाण्‍डे के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और देखते ही देखते बात मारपीट तक पहुंच गई है। जो कि आज तक चल रही है। छत्‍तीसगढ़ प्रदेश एक औद्योगिक क्षेत्र है। जहां अधिकतर रोजगार बिहारियों को और दक्षिण भारतीयों को मिला है। जहां भिलाई की कहें तो छोटा बिहार के नाम से भी जाना जाता है। ये मुद्दा क्षेत्रवाद का नहीं है, लेकिन स्‍थानीय निवासियों को हीन-भावना से देखना और बिहार के लोगों को भिलाई में रोजगार दिलाने जैसे कार्य को लंबे समय से प्रेमप्रकाश पाण्‍डे करते आ रहे हैं। छत्‍तीसगढियों को डरा-धमकाकर अपने रिश्‍तेदारों, पहचानवालों को इस्‍पात संयंत्र में रोजगार दिलाने जैसी बात लंबे समय से चल रहा है। चूंकि पाण्‍डे जी इस्‍पात संयंत्र के अध्‍यक्ष भी थे जिनकी पहचान वरिष्‍ठ अधिकारियों से भी थी। जो छत्‍तीसगढियों के शोषण के लिए बहुत था। समय बीतने के साथ अधिकतर बिहारियों का दमन भिलाई के छत्‍तीसगढियों के खिलाफ बढ़ता गया। महाराष्‍ट्र की घटना ने छत्‍तीसगढियों की नींद उड़ा दी और अपने हक के लिए भिलाई निवासी शक्ति प्रदर्शन (मारपीट) करने से नहीं चूके।
राजठाकरे की भूमिका ने भले ही महाराष्‍ट्र में आग लगाई है लेकिन छत्‍तीसगढ़ में भी इसका असर देखा गया और छत्‍तीसगढिया बिहारियों के वर्चस्‍व ने लड़ाई के लिए विवश किया। मुझे ज्‍़यादा जानकारी बिहारियों के बारे में नहीं था। लेकिन भिलाई जाने पर पता चला कि छत्‍तीसगढ़ के मूल निवासी झोपड़ी में और बिहारी बड़ी मंजिलों में रहते हैं इसका मुख्‍य कारण बिहारियों की असलियत सामने लाती है। मगर सोचने के लिए प्रेरित करने वाला वाक्‍या ये है कि क्‍या पूरे प्रदेश में बिहारी ऐसे ही हैं या फिर बिहार के लोग ही ऐसा करते हैं। पूरे प्रदेश का तो पता नहीं लेकिन फिलहाल सांसद और पूर्व विधायक के बीच छत्‍तीसगढियों और बिहारियों के वर्चस्‍व की लड़ाई भाजपा ने सांसद ताराचंद साहू के निष्‍कासन से शुरू कर दिया है। और आगे चलकर इसका परिणाम भी मिल सकता है। लेकिन बिहारियों का भविष्‍य छत्‍तीसगढ़ में ? ? ?

Thursday, December 4, 2008

पाकिस्‍तान राष्‍ट्रध्‍वज में लगी आग

देश का सबसे बड़ा आतंकी हमला भले ही मुंबई में हुआ हो। लेकिन हर एक देश वासियों में उस आतंकी हमले को लेकर नाराज़गी इस कदर है कि अपनी परवाह किए बगैर ही आतंक के सरताज पाकिस्‍तान को आतंकी संगठनों का हवाला देकर नारेबाजी की गई। लेकिन बात आतंकी हमलों तक ही सीमित नहीं रही और न ही मुंबई तक। हर एक देशवासी चाहे वो अमीर हो या गरीब। हर कोई आतंकी हमले पर मुंहतोड़ जवाब देना चा‍हता है।
राजधनी रायपुर में छत्‍तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी द्वारा पाकिस्‍तान का झंडा जलाया गया। प्रदेश कांग्रेस कमेटी का ये गुस्‍सा एक हद तक सही भी है, लेकिन कुछ आतंकियों के कारण पाकिस्‍तान के राष्‍ट्रध्‍वज का अपमान करना भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए पता नहीं क्‍या संदेश देना चाहती है।

आतंक के खिलाफ आतंक के रूप में जवाब देना करोड़ों देशवासियों को हिंसा की ओर भेज सकती है और हिंसात्‍मक रूप शांति का प्रतीक कभी नहीं होता। आतंकियों का जवाब देने के लिए हमारे देश के फोर्स, कमाण्‍डो, बटालियन पर देशवासियों को भरोसा करना होगा। जो अपनी जान परवाह किए बगैर देश की रक्षा के लिए जान न्‍यौछावर कर देते हैं। मैं सलाम करता हूं ऐसे वीर शहीदों को जो देश में शांति और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर देते हैं।

Saturday, October 18, 2008

देह व्‍यापार और मानव तस्‍करी का अड़डा है छत्तीसगढ़ का आदिवासी क्षेत्र |

छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा लडकियों के विकास के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। उसके बाद भी राज्य के आदिवासी बाहुल्य जशपुर तथा सरगुजा जिले की हजारों लडकियां महानगरों की सब्जबाग के झांसे में आकर वहां नरक की जिंदगी जी रही हैं। कईयों की मौत के बाद उनकी लाश तक घर नहीं पहुंच पाई। किसी तरह भागकर घर पहुंची लड़कियां विक्षिप्त और रोग ग्रस्त होकर काल के गाल में समा गई। इसके बाद भी अच्छी नौकरी दिलाने के नाम पर इन आदिवासी क्षेत्रों से लड़कियों की तस्करी जारी है। अब तक कई तस्कर भी पकड़े जा चुके है। लेकिन सरकार इस दिशा में गंभीर नहीं हुई है। बंग्लादेश, मिजोरम तथा नेपाल की तरह छत्तीसगढ़ की लड़कियों की तस्करी पिछले सात सालों से बखौफ चल रहा है। लड़कियों को दिल्ली, गोवा जैसे महानगरों का सब्जबाज तथा ऐश की जिंदगी जीने सपना दिखाकर तस्कर अपने जाल में फांस रहे हैं। लेकिन दुभाग्य की बात है कि सरकार द्वारा इस ओर कोई सार्थक पहल नहीं किया जा रहा है। जशपुर में मानव व्यपार के खिलाफ पिछले दो सालों से अभियान चला रही संत अन्ना एनजीओ की सि. सेवती पन्ना बताती हैं कि सन् 2005-07 में किये गये सवरॊ में जशपुर के 98 पंचायतों से 3191 लड़कियों को एजेंटों ने अपने जाल में फांसकर कथित प्लेसमेंट एजेंसियों के हवाले कर दिया। अगर पूरे जशपुर जिले का सर्वे किया जाये तो यह आकड़ा बीस हजार तक पहुंच सकता है। उन्होंने बताया कि दलालों को एक लड़की पर छह हजार से लेकर आठ हजार रूपये तक कमीशन मिलता है। यह कमीशन तब और भी यादा होता है जब लड़की की उम्र बारह से पन्द्रह साल के बीच होती है। जहां से एजेंट लड़कियों को दिल्ली स्थित प्लेसमेंट एजेंसियों के हवाले कर देते हैं। वहां एजेंसी संचालक महिने भर तक लड़कियों को छोटे-छोटे कमरो में पन्द्रह, बीस-बीस की संख्या में रखते है और उनके साथ लड़के भी होते हैं। जहां उन्हें जबरन शराब पिलाई जाती है, ब्लू फिल्म दिखाई जाती है और उन्हें कई लोगों के साथ सेक्स के लिए अभ्यस्त किया जाता है। महिने भर बाद उन्हें रईस जादों के बंगलों में काम करने के लिए भेज दिया जाता है। बंगलों के मालिक प्लेसमेंट एजेंसी के संचालकों से 11 माह के लिए अनुबंध करते हैं। पैसा सीधे लड़की को न देकर प्लेसमेंट एजेंसी के संचालकों को मिलती है। उसका बीस-पचीस फीसदी राशि ही लड़कियों को दी जाती है। प्लेसमेंट एजेंसी में ही लड़कियों के साथ शारीरिक, मानसिक प्रताड़ना खत्म नहीं होती बल्कि जब ये लडक़ियां रईसों के घर काम करती है वहां भी इनके साथ जानवरों की तरह सलूक किया जाता है। घर मालकिन जहां इन्हें खाना नहीं देकर तथा मारपीट करते हुये प्रताड़ित करती है वहीं दूसरी तरफ इात के साथ खिलवाड़ होता रहता है। कभी बंगले का मालिक तो कभी उसका बेटा और कभी उसका गार्ड व ड्राईवर अपनी हवस मिटाते रहते हैं। उन्होंने बताया कि जिस हालत में गांव छोड़कर लड़कियां जाती है उस हालत में नहीं लौट पाती। कईयों की तो वहीं मौत हो जाती है और लाश तक का पता नहीं चलता। जशपुर के बगीचा थाना क्षेत्र स्थित महुवाडीह निवासी आलोचना बाई 17 वर्ष की घर लौटते ही मौत हो गई। जबकि तीन अन्य लड़कियां विक्षिप्त अवस्था में घर लौटी । जशपुर में तीन साल के भीतर 11 लड़कियों की मौत हो चुकी है। आलोचना बाई के ईलाज के नाम पर प्लेसमेंट एजेंसी ने तीस हजार रूपये का बिल उसके पिता को थमा दिया और बेटी को किसी तरह घर तक लाने में जमीन जायजाद बिक गई। आलोचना ही एक ऐसी लड़की नहीं है बल्कि सरगुजा जिले के सीतापुर क्षेत्र स्थित राजापुर निवासी एक लड़की की लाश दिल्ली में ही सड़ गई। यह युवती अपनी छोटी बहन के साथ दिल्ली चली गई थी। इस घटना के बाद आशंका जताई जा रही थी कि जब वह गर्भवती हुई होगी तो उस पर गर्भपात का दबाव डाला गया होगा और जब उसने इंकार किया होगा तो उसकी हत्या कर दी गई। इस आशंका पर पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। इसी तरह कोट छाल निवासी 17 वर्षीय सीतो बाई को एजेंट द्वारा अपने साथ ले जाया गया था लेकिन कुछ महिने बाद एक सुबह वह घर के बाहर विक्षिप्त अवस्था में पडी हुई मिली। उसके हाथ-पैर बंधे और टूटे हुए थे। मानव तस्क री से सरगुजा और जशपुर के शैक्षणिक संस्थान भी सुरक्षित नहीं रह गये है। सरगुजा जिले के राजपुर विकासखंड स्थित कोदौरा के मिशन स्कूल के हॉस्टल से तीन लड़कियों को एजेंट ने दिल्ली ले जाकर नरक के दलदल में डाल दिया था। इनमें एक गुंगी लड़की भी थी। सरगुजा में मानव तस्करी तथा एड्स जागरूकता के खिलाफ काम कर रहे आशा एसोसिएशन तथा नवा बिहान कल्याण समिति के पदाधिकारियों ने छुटकारा दिलाया। ये दोनों एन.जी.ओ. कुछ सालों से मानव तस्करी के खिलाफ काम कर रहे है। एनजीओ को मानव तस्करी व एड्स के खिलाफ अभियान चलाने के लिए क्रिश्चयन रिलिफ सर्विस द्वारा दो वर्ष पूर्व बजट उपलब्ध कराया गया था। संत अन्ना की सि. सेवती का कहती है कि उन्होंने दिल्ली स्थित 144 प्लेसमेंट एजेंसियों का निरीक्षण किया है और वहां रहने वाली लड़कियों की नरकीय जिन्दगीं को नजदीक से देखा है। दिल्ली में करीब तीन हजार प्लेसमेंट एजेंसियां है और करीब-करीब सभी एजेंसियों का नाम देवी देवताओं तथा धर्म पुरोहितों के नाम से है। इनमें मरियम, गणेश, संत अन्ना, जय माँ दुर्गा, मदर टेरेसा, आदि शामिल हैं। इन नामों का बोर्ड लटके देख किसी को सहसा यकिन नहीं होता कि यहां काम दिलाने के नाम पर लडक़ियों के साथ जल्लाद जैसा व्यवहार भी होता होगा। उन्होंने बताया कि लड़कियों का नाम तथा पता प्लेसमेंट एजेंसी में बदल दिया जाता है ताकि कोई उन्हें ढूंढने जाये तो उसका पता न चले। सरगुजा तथा जशपुर के अलावा रायगढ़ तथा झारखंड एवं बिहार की लड़कियों को भी दलाल अपने जाल में फांस रहे है। झारखंड की तीन लड़कियां मार्च 2006 में गर्भवती हो गई थी। इनमें एक लड़की जयपुर के आबकारी अधिकारी के घर में काम करती थी जहां उसके साथ अधिकारी के प्रमोद नामक बेटे ने बलात्कार किया । जब वह गर्भवती हुई तो कमिश्नर के बेटे ने गर्भपात कराने का दबाव डाला। जब उसने इससे इंकार कर दिया तो एक रात उसे गार्ड के माध्यम से इस रईस जादे के बेटे ने घर से निकाल दिया और वह चेतनालय नामक एक एनजीओ में पहुंची और जहां आप बीती बताई। चेतनालय के डोमेस्टिक वर्कर फोरम ने युवती को जयपुर पश्चिम कोतवाली ले जा कर घटना की रिपोर्ट लिखवाई । फोरम के निर्देशक सिस्टर लेवना बताती हैं कि पुलिस ने अपराध दर्ज कर आरोपी युवक को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन डाक्टरी रिपोट में बलात्कार का मामला नहीं आने पर आरोपी बेल पर न्यायलय से छूट गया । अब मामला न्यायलय में विचाराधीन है पर गरीबी एवं जागरूकता के अभाव में पीडित युवती कोर्ट नही आ रही है। इससे आरोपी युवक न्यायालय से बरी हो सकता है। कई रईस जादे प्लेसमेंट एजेंसियों से लड़कियों को काम पर इसलिए भी रखते है ताकि उन्हें और उनके परिवार के युवकों को शादी के पहले वेश्यालय न जाना पड़े। नवा बिहान कल्याण समिति के नौसाद अली बताते है कि मानव तस्करी की समस्या काफी गंभीर हो गई है। इससे सरगुजा जिले के कुसमी, शंकरगढ़, बतौली, सीतापुर, उदयपुर क्षेत्र सबसे यादा प्रभावित है। सीतापुर, बतौली तथा उदयपुर विकासखंड का निरीक्षण किया गया था जिसमें 762 लड़कियां दिल्ली गई थी। लेकिन उस समय लोग खुलकर बताने को तैयार नहीं थे। संस्था ने आशा एसोसियएशन के साथ मिलकर सर्वे करना शुरु किया तो एक-एक गांव से चालीस-पचास लड़कियां गायब मिली। इसके लिए जागरुकता का कार्यक्रम शुरु किया गया। इसका अच्छा प्रतिसाद देखने को मिला लेकिन सरकार द्वारा इसके लिए कोई बजट नहीं मिलने के कारण वे ठीक से काम नहीं कर पा रहे है। इसी सप्ताह सरगुजा जिले से दिल्ली गई 70 लड़कियों को वापस लाया गया। ये लड़कियां अब भूलकर भी वहां नहीं जाना चाहती। नौसाद बताते है कि दोनों संस्थाओं द्वारा ऐसी लड़कियॊ के अभिभावकों से संपर्क कर पहले तो गुमशुदगी की थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई जाती है या फिर बहला फु सलाकर ले जाने की जानकारी पुलिस को दी जाती है। इसके बाद पंचायत से युवती तथा उसके अभिभावक रिश्ता बताते हुये एक प्रमाण पत्र पंचायत से जारी किया जाता है। जिसमें दोनों का फोटो होता है। इतनी कार्रवाई कर अभिभावाकों को दिल्ली भेज दिया जाता है। दिल्ली में मानव व्यापार के खिलाफ काम करने वाले सिस्टर सोफिया व मैक्सिमा युवतियों को जाल से छुडाने अभिभावकों का मदद करती हैं। नौसाद मानव व्यापार रूपी इस पलायन को देह व्यापार का बिगड़ा स्वरूप मानते हुए कहते है कि इससे सरगुजा तथा जशपुर में एड्स की भयावह स्थिति है। अगर जांच की जाये तो चौकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। सिस्टर सेवती पन्ना कहती है कि कई लड़कियां वापस घर आने के बाद दोबारा फिर दिल्ली जाना चाहती है। इसका प्रमुख कारण है कि गांव लौटने के बाद उन्हें समाज दूसरी नजर से देखने लगता है और वे कुंठित रहने लगती है। यही नहीं वहां रहकर ये लड़कियां फ्री सेक्स के लिए स्वतंत्र रहती है। लेकिन यहां वह संभव नहीं होता। सब्जबाग में फंसकर लड़कियॊ के दिल्ली जाने के लिए सेवती पन्ना गरीबी को यादा जिम्मेदार नहीं मानती बल्कि वे नैतिक शिक्षा के अभाव को महत्वपूर्ण मानती है। एनजीओ ने जब लड़कियॊं की तस्करी के खिलाफ काम करना शुरु किया तो मामला खुलकर सामने आया और पुलिस ने भी एजेंटो के खिलाफ कार्रवाई शुरु की। दोनों जिलों में कुछ सालों के भीतर दर्जन भर से अधिक एजेंट पकड़े जा चुके है। इन एजेंटों में महिलाएं तथा स्थानीय लोग भी शामिल हैं। जशपुर के कुनकुरी में एजेंटो के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर उन्हें छोड़ देने का मामला विधानसभा में भी उठा था और गृहमंत्री ने कुनकुरी थाना के तीन पुलिस कर्मियों को निलंबित कर दिया था। उसके बाद भी दोनों जिलों सहित दूसरे प्रभावित राज्यों में पुलिस द्वारा एजेंटो पर सख्ती से कार्रवाई नहीं की जाती। जशपुर में बाहरी एजेंटों के अलावा लड़कियॊ की तस्करी में लोहार तथा डोम जाति के लोगों का हाथ भी सामने आता रहा है। यही नहीं जशपुर जिले के सोनकयारी गांव का एक व्यक्ति दिल्ली में प्लेसमेंट एजेंसी चलता है और इसी समय कुनकुरी की दर्जनों लड़किया दिल्ली स्थित श्री गणेश प्लेसमेंट एजेंसी में फसी हुई है। बताया जाता है कि इन्हें जशपुर के बटईकेला निवासी बंटी नामक एजेंट ने एजेंसी के हवाले कर दिया है। जशपुर में लड़कियों को काम दिलाने के नाम पर तस्करी का धंधा सन् 2000 के आस-पास शुरु हुआ था। उस समय लड़कियां खुद काम की तलाश में बड़े शहरों की ओर रुख कर रही थी। लेकिन उस समय इसका पता शायद उस समय किसी को नहीं था कि आने वाले दिनों में इसका भयावाह रूप देखने को मिलेगा। वहीं सरगुजा में इसकी शुरुवात मैनपाठ से हुआ जहां के गलीचा सेंटर वाले क्षेत्र के लड़कियों को बनारस स्थित भदोही के कालीन उद्योग के लिए भेज रहे थे। मैनपाठ से लड़कियों की तस्करी अभी नहीं रूकी है। आशा एसोसिएशन के डायरेक्टर फादर विलियम ने बताया कि संस्था द्वारा इन दिनों सीतापुर क्षेत्र के 50 गांव में लोगों को जागरूक करने के लिए काम किया जा रहा है लेकिन जागरूकता कार्यक्रम में सबसे बड़ी बाधा लोगों द्वारा धर्मान्तरण की गलतफलमी है। दूसरी समस्या पंचायतों से पंचायत प्रतिनिधियों का सहयोग नहीं मिलना है। संस्था के कार्यकर्ताओं के साथ दिल्ली,मुंबई,बंगलोर से पीड़ित होकर लौटी लड़कियों द्वारा गांवो में जाकर लोगों को आप बीती सुनाई जाती है ताकि एंजेटों के बहकावे में दूसरी लड़कियां न आवे। संस्था द्वारा गांव में निगरानी समिति भी बनाई गई है जो गांव में लडकियों को बहला-फुसलाकर ले जाने वालों पर नजर रखती है। लड़कियों की तस्करी को देखते हुये राष्ट्रीय स्तर पर घरेलू कामकाजी महिलाओं तथा लड़कियों के लिए कानून बनाने पर भी विचार किया गया। मार्च 2007 में भी मंत्रालय ने देश भर के सभी राज्यों से महिला बाल विकास तथा एनजीओ के प्रतिनिधियों को इसके लिए आगे आने कहा था। लेकिन छत्तीसगढ़ की एक मात्र सिस्टर सेवती पन्ना इस बैठक में गई थी। अभी तक सरकारी स्तर पर डोमेस्टिक वर्करों के लिए कोई कानून नहीं बनाया जा सका है। मुझे आज तक पता नही चल पाया कि सरकार की योजनाएं लडकियों की किस दशा को बेहतर बनाने प्रयासरत है \

Monday, October 13, 2008

सलवा जुडूम के संदर्भ मे

छत्‍तीसगढ़ में नक्‍सल समस्‍या से प्रदेशवासी अवगत है लेकिन पुलिस महानिदेशक विश्‍वरंजन का कहना है कि यह समस्‍या ए‍क राष्‍टीय समस्‍या है बडी देर से ही सही लेकिन पुलिस महानिदेशक इस समस्‍या को लेकर चिंतित दिखे ही। लेकिन दूसरी ओर एक खबर हवे मे उडकर आयी वो ये कि, बजरंग दल और अन्‍य धार्मिक संगठन पर भी प्रतिबंध लगया जा रहा है पता नही देश का क्‍या हाल होगा लेकिन अगर धार्मिक संगठन को बंद कर दिया गया तो लाठी, डंडे और तलवार, भाले ,ऋशूल वाले संगठन पार्टी का क्‍या होगा, और सलवा जुडूम का क्‍या होगा जहां आदीवासी तीर धनूष के बल पर नक्‍सलीयों से लडते है मै तो सोच रहा था कि बजरंगी सलवा जुडूम का साथ देने वाले है और वैसे भी आदीवासी वर्ग ही धर्मांतरण कर रहे है एक तीर से दो निशाना हो जाएगा। नक्‍सली समस्‍या भी खत्‍म हो जाएगा ।
जिस धार्मिक संगठन को राजनीतिक पार्टियां आतंकवादी संगठन कह रही है वह तो जानते ही नही कि अस्‍त शस्‍त का उपयोग करने संगठन नक्‍सली इलाकों मे कूच करने वाले है ऐसे धर्म के रखवाले को नक्‍सलीयों से डर नही लगता। ये खबर मुझे कुछ महीने पूर्व वेलेन्‍टाइन डे, और फ्रेन्‍डशिप डे के दिन मालूम चल गया, जब राजधानी रायपुर मे ये संगठन इस आयोजन को पश्‍चिमी संस्‍क़ृति बताकर विरोध प्रर्दशन कर रहे थे इतनी बहादूरी भला किस संगठन मे हो सकती है।अखबार से लेकर टी़वी़ चैनल तक में हेडलाइन्‍स बनने वाले धार्मिक संगठन को भारत के लोग कितने हल्‍के मे ले रहे है ये राजनेताओं के मानसिक दिवालियापन को दर्शाता है
मै तो अगली चिटठी पुलिस महानिदेशक को लिखने वाला हू और उनसे आग्रह करूंगा कि जितने भी धार्मिक संगठन है उन्‍हे तत्‍काल सलवा जुडूम आंदोलन के लिए भेजा जाएं ,और तैयारी कराने की कोई जरूरत न‍ही है उनकी देशभक्ति पर कृपया शक न करें ये हमारे धर्म को बचाने के लिए हमेशा आगे रहते है और वैसे भी जब ये एक राष्‍टीय समस्‍या है तों फिर राष्‍ट सेवा का मौका देना तो बहूत जरूरी है।
धन्‍यवाद

Wednesday, October 8, 2008

और फिर गरीब की झोपड़ी से ?





मैं एक सामान्य इंसान से मिला जिसे बॉलीवुड की विचित्र दुनिया मे स्वयं सहायक भूमिका के साथ लाखों बुराइयों के बावजूद प्यार करते हुए दिखाया गया ,क्या वास्तव मे वह गांधी जी थे या फिर कोई और लेकिन जब शहर की गलियों मे एक प्रभावशाली व्यक्तित्व की तलाश करते घूमा तों कांसे मे ढले सार्वजनिक पार्क मे सरकारी संस्थानो के बाहर अकेले खडे कुछ सोंच रहे थे देखते ही देखते भारतीय रिजर्व बैंक के करेंसी नोट पर उनकी फोटो छपी थी
मझोले कद का वह व्यक्ति , छरहरा बदन, चश्मा पहने व लम्बी लाठी लिए, सफेद धोती बांधे अपने ढंग की पुरानी सी विशेष घड़ी के साथ पता नही चौराहे पर क्यो खडे है वहां खडें कुछ बुजूर्गो ने कहा की ये हमारे आदर्श पुरूष है और अंग्रेज इनसे डरकर भाग गए।1947 की आजादी मे इनका महत्तवपूर्ण योगदान था। (लेकिन कैसी आजादी ? )

अमीर धरती मे कुछ गरीबों के लिए भी सोंचा जाता है ऐसे ही एक राजनीतिक पार्टी के स्लोगन मे नजर गई ,, कांग्रेस का हाथ गरीब के साथ ,, भाजपा सरकार गांव गरीब और किसान की सरकार ,,जो बहूजन की बात करेगा,,,-और भी राजनीतिक पार्टिया गरीबो का साथ देने की बात करते नजर आयी ,पर गरीब कहा रहते है ?

गरीबों के आदर्श व्यक्तित्व की तलाश करते मेरी नजर ने एक अन्य उपस्थिति दर्ज की वह थी नीला सूट काली टाई व मोटे फ्रेम का चश्मा लगाए और अपने बॉये हाथ से कलेजे पर लगायी एक पुस्तक के साथ खड़ा -वह व्यक्ति ? मैने उसे दलितों के बीच हर जगह पाया ,पता नही लगा पाया की संविधान निर्माता वाकई डॉ. भीमराव अम्बेडकर हैं जब तक की दलितों की एक टोली से मेरी मुलाकात नही हुयीं इनका रूपचित्र उनकी दीवारों पर लगा और उनके शब्द उनके होंठों पे हावी,,,,

मेरे मन में विचार आया कि क्या एक धोती धारी और एक कोट धारी महापुरूषो को भी अमीरी और गरीबी ने बांट दिया तभी दलितों के बीच एक बूढ़ी औरत ने पूछा की - बेटा क्या पूरे विश्व मे गांधी जैसे अंबेडकर भी मशहूर है। मै फिर ? ? ? ? ?

Tuesday, October 7, 2008

कही गुम हो गई है मानवता....?

राष्‍ट्रीय मानव अधिकार आयोग द्धारा उच्‍चतम न्‍यायालय में सौंपी एक रिपोर्ट में नक्‍सली गतिवधियों पर काबू पाने के लिए शुरू किए गए सलवा जुडूम आंदोलन से हो रहे अत्‍याचार पर,,, छत्‍तीसगढ मे सलवा जुडूम आंदोलन को क्लिन चीट मिल चुकी है संवेदनशील इलाकों से आदिवासीयों को सलवा जुडूम कैंप में रखकर भरपूर ख्‍याल रखा जा है, जिसमे मेरे एक मित्र तुलेन्‍द्र पटेल की कविता से आंदोलन और न्‍याय करने की रीति नीति से मानवता कलंकित हो चुकी है........?
मानव बढ् गए है
मानवता घट गयी है
पहले भावना विशाल थी
अब सिमट रहे है
बाद रही है दूरियां
आदमी की आदमी से
इंसान की लाश अब
चौराहे पर लटक रहे है
किसी की कलाई मे
सोने की घडी होती है
किसी की कार
मोंतियों से जडी होती है
और किसी की लाश
बिना कफन के पडी होती है

Monday, October 6, 2008

पत्रकारिता विश्वविद्यालय बनाम चटूकारिता विश्वविद्यालय

कुशाभाउ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं भारतीय लोकतंत्र के निचले से भी न्यूनतम हो चुके है। अधिकतर छात्र इसका विरोध भी करते आएं है। लेकिन विश्वविद्यालय अपने मूलमंत्र 12 चपरासी फुल अययाशी, में व्यस्त है। पत्रकारिता के नाम पर नाममात्र शिक्षा मिलती है। और चटूकारिता करने में फूल नम्बर। इस घटना को एक साल हो चुके है। 4 अक्टूबर 2007 को छात्र धरने पर बैठ गए। छात्रों की मांग सिर्फ शिक्षकों की भर्ती को जल्द से जल्द पूरा करने की थी। जिसे आज 1 साल हो चुके है, पिछले साल विज्ञापन भी निकाले गए और साक्षात्कार भी हो चुका,लेकिन शिक्षको की भर्ती प्रक्रिया का कोई पता नही ,पिछले साल सीनियर ,जूनियर छात्र एक साथ मांग पर आंदालने में कूदे थे। सीनियर छात्रों की पढ़ाई पूरी हो गई। जूनियर छात्र आज भी पढ़ रहे है लेकिन मात्र 3 शिक्षक है, जो पहले से ही है। आज तक छात्र शिक्षक के बगैर लाइब्रेरी के भरोसे पढ़ाई करते है। लाइब्रेरी में पुस्तके भरी हुई है इन्ही पुस्तकों को पढ़कर छात्र आंदोलन मे कुद पडे थे। धन्य हो कुलपति महोदय का पुस्तकें तो उपलब्ध हो पाई।
कुलपति महोदय से पढ़ाई के बारे में चर्चा करने पर घूमा-फिराकर कर जवाब देते है। 52 हजार फीस देकर पढ़ाई करने वाले छात्र-छात्राओं को संतुष्ट करने के लिए पडोसी राज्य मध्यप्रदेश के माखनलाल वि.वि. से मेहमान शिक्षक भी बुलाएं जाते रहे है। और रविवार को भी कक्षा लगने का कार्य भी तगड़ा चला ,फिर सभी माहौल शांत होते देख वि.वि.प्रशासन खामोश हो गया ,छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले कुलपति महोदय फिल्मी डॉयलॉग भी सुनाते है महोदय के सीधे-साधे रवैये से छात्र हर बार ठगे जाते रहे है। और आज तक पुनरावृत्ति हो रही है।
छात्र हर बार की पुनरावृत्ति से दो धड़ मे बट चुके है। एक तरफ पत्रकारिता के तो दूसरी तरफ चटूकारिता के छात्र आपसे मे भीड़ जाते है। और वि.वि. प्रशासन खामोश रहता है। अब समस्या क्षेत्रवाद तक बढ़ गया है, छात्र क्षेत्रवाद के शिकार हो रहे है। पूरे वि.वि. में अराजकता का माहौल बढ़ाता जा रहा है। तो छात्र भी चुप्पी साधे हुए है। छत्तीसगढ़ सरकार के सात वि.वि. में कुशाभाउ ठाकरे पत्रकारिता वि.वि.भी शामिल है, जो फिलहाल किराए के भवन में संचालित हो रही है। वि.वि. में अटल बिहारी बाजपेयी का योगदान भी है रमन सरकार के कार्यकाल में इस वि.वि. का हाल बेहाल है। जब पांच साल के कार्यकाल मे छात्रों को शिक्षक मुहैया नही कर पायी तो आगे कार्यकाल मे इसका हाल प्रशासन भरोसे है
फिलहाल अधिकतर छात्र चटूकारिता करने से व्यस्त है, और अव्यवस्था के खिलाफ बोलने वाले बचे कुछ छात्र डिफाल्टर घोषित हो चुके है और यही चटूकारिता करने वाले छात्र आगे चलकर राजनीति करने की बात करते है पता नही हमारे लोकतंत्र का और चटूकारिता-पत्रकारिता का भविष्य किसके हाथ में है……………………………………….

आज भी धरती के उपर होती है -गेडी डांस

अगर आपको छत्‍तीसगढ् में सडक की उंचाई से बांस के सहारे कोई व्‍यक्ति या बच्‍चा नाचते झूमे दिखे तों डरीए नहीं, छत्‍तीसगढ् में बांस के सहारे डांस करना एक कला है जो काफी सावधानी से किया जाता है, छत्‍तीसगढ् मे पोला त्‍यौहार के समय हर गांव अंचल मे गेडी नाच आसानी से देखने को मिलती हैा बांस के लम्‍बे डंडे में ,एक हिस्‍सा अलग से जोड्ा जाता है उस हिस्‍से पर पैर रखा जाता है और फिर दौड् कर ,चलकर एक जगह से दूसरे जगह कलामक त्‍ढ्ग से आसानी से चलना ही इस डांस का मुखय पैमाना होता हैा प्राय दक्ष प्रतिभागी ही आसानी से गेडी डांस मे थिरकते है,गेडी डांस की शुरूआत पोला त्‍यौहार को माना गया है खेती बीज बोने के बाद किसान खुश होकर नाचने के लिए बांस का गेडी बनाते हैा आधूनिककिरण के दौड में भले ही गेडी डांस शहर से दूर हो चुकी है लेकिन ग्रामीण अंचलो में आज भी युवा और बच्‍चे गेडी डांस का लुत्‍फ उठाने नही चुकते है छत्‍तीसगढ् के प्रमुख त्‍यौहारों में पोला त्‍यौहार को स्‍थान मिल चुक हैा अब विशेष मौके की तलाश कर ग्रामीण झूम उठते हैा और धरती के उपर झूमना और मस्‍ती करना भला किसे अच्‍छा नही लगता

Saturday, October 4, 2008

छात्र संगठनों ने बढ़ा दी है बेरोजगारी ?

भारत में आज जितना महत्‍व राजनीति में युवाओं को दिया जा रहा है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है, कि राजनीतिक झंडा पकड़कर नारे लगाना, विरोध प्रदर्शन करना, धरने पर बैठना और बेगारी भरा काम करना जिससे राजनीति के एप्रोज में पकड़ हो जाए, में युवा बेरोजगारों का प्रयोग किया जा रहा है। छत्‍तीसगढ़ के संदर्भ में बात करें तो युवा शक्ति, राष्‍ट्रशक्ति का बहाना बनाकर पूंजीपति वर्ग, मध्‍यम वर्ग के युवाओं के साथ राजनीतिक स्‍वार्थ निकालने के साथ मध्‍यम वर्गीय परिवार में बेरोजगारी को बढ़ा रही है। जिस उम्र में युवाओं को रोजगार संबंधी जानकारी और घर-परिवार की ओर ध्‍यान देने की ज़रूरत होती है। उस उम्र का प्रयोग राजनीतिक पार्टियों की कठपुतली बनकर करते हैं।

युवाओं का उपयोग राजनेता व्‍यक्तिगत स्‍वार्थ के लिए तो करते ही हैं। साथ ही युवा राजनीति से भटक चुके हैं, युवाओं को राजनीति में धरना प्रदर्शन के अलावा कुछ नज़र नहीं आता। कुछ छात्र संगठन का तो हाल ये है कि छोटे-मोटे काम जैसे परीक्षा के समय पेपर लीक करवाना, चुनाव के समय शराब बंटवाना और मोहल्‍ले में दल-बल के साथ मारपीट करना और फिर संगठन को चलाने वाले नेता से फोन पर कानूनी मदद की पेशकश की जाती है। और बात जब यहां तक न बने तो दूसरी पार्टियों के युवा संगठन से मिल जाते हैं, और पूर्व संगठन पार्टी के विरोधी होते हैं।
सभी थानों में एक नज़र डालें तो फाइलों की संख्‍या में राजनीतिक युवाओं का नाम अधिक आता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस कदर युवा बहक गए हैं। जो अपराध करने में अपना समय बि‍ताते हैं। जिसकी शुरूआत, महाविद्यालयीन छात्रसंघ चुनाव से ही हो जाती है, पढ़ने के समय राजनीति की शुरूआत हो जाती है। कुछ छात्र तो कॉलेज से पढ़ने के बाद सांसद, विधायक, महापौर, पार्षद और सरपंच बन जाते हैं। फिर भी युवाओं में बेरोजगारी को लेकर बहस होते रहती है। पिछले 30 सालों से राजधानी रायपुर के दुर्गा महाविद्यालय से अनेक छात्र नेता महत्‍वपूर्ण पदों पर आसीन हुए हैं। फिर भी युवाओं में बेरोजगारी दूर नहीं हुई है।

छत्‍तीसगढ़ में युवा बेरोजगारों की संख्‍या इस कदर हावी हो चुकी है, कि वो कुछ पैसों के लिए बड़े-बड़े कारनामे कर सकती है। दूसरों के जान की को नहीं होती। ये छत्‍तीसगढ़ का सौभाग्‍य है कि कोई बड़ी घटना युवा बेरोगारों ने अब तक नहीं की। पर ये कब तक चलेगा। जिस दिन बेरोजगारी और बढ़ जाएगी। छत्‍तीसगढ़ में दिल्‍ली के धमाकों की आवाज़ आएगी।