लम्बे समय से आराक्षण् के आग मे सभी जल गए जिसमे प्रमुख् रहा राजनीति मे आरक्ष्ण् का ,1947 से आरक्ष्ति सीटो पर आरक्षित वर्गेां का कब्जा रहा लेकिन क्या आरक्षित वर्गों का भला हो पाया और क्या राजनेता आरक्षित वर्ग का भला करने मे सक्षम है लम्बे दौर से आरक्षण केवल नीची जाति वर्ग के लोगों के लिए ही है जो आज तक चले आ रही है। ये भारत मे वर्ग विशेष की दबाव नीति से निचे वर्ग खासकर अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति को आरक्षण है आजादी के बाद भी शिक्षा,राजनिती, व्यवसाय और कई स्थानों पर आरक्षण का मिलना एक अलग तरह के भेदभाव को जन्म देता है, खासकर ऐसा वर्ग जो आज तक अपनी उपस्थ्िति समाज मे सभ्य मानसिकता के तौर पर बना नही पाएं , लेकिन सोचने वाली बात ये है कि अपने आरक्षित क्षेत्र से राजनेता भी गएं और आरक्षण बना भी रहा पर भेदभाव खत्म क्यो खत्म नही हुआ। क्यो आख्रिर आरक्षण की जरूरत राजनेताओं को पड रही है
लोकसभा चुनाव और गर्मी महीना अपने उम्म्ीदवारों के चयन मे ही राजनीतिक पार्टियां सिमट कर रह जाएंगी सबसे पहले तो भेदभाव ही ये प्रत्याशी और प्रतिनिधि बनाते है। अगर बात करे छत्तीसगढ् प्रदेश् की तो हाल ही मे सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में रायपुर के ऐसे प्रत्याशी (नंदे साहू ) जो लम्बे से राजनीति में सक्रिय नही रहें, जितना कि विपक्षी पार्टी के प्रत्याशी (सत्यनारायण् शर्मा) सक्रिय रहे और प्रदेश कांग्रेस कमेटी में कार्यकारी अध्यक्ष पद पर रहे । रायपुर राजधानी में भी साहूवाद जातिवाद हावी रहा है, जिसके कारण् नंदे साहू जीते और विधानसभा भी गए । साहू जी की जीत जातिगत समीकरण् और भेदभाव को बढावा देने की बात करे तों शायद कुछ गलत नही ।
अब फिर एक बार जातिगत समीकरनों की चर्चा है जो कि लोकसभा प्रत्याशी चयन के लिए आवश्यक मान ली गई है। छत्तीसगढ् मे 11 लोकसभा सीट के लिए मात्र जांजगीर संसदीय क्षेत्र ही अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित है जिसमें सर्वाधिक 42 उम्मीदवार की कतार है जो अपनी-अपनी दावेदारी पेश् कर रहे है अनुसूचित जाति वर्ग के प्रदेश भर के उम्मीदवार अपनी सीट पक्की मान रहे है लेकिन जातिगत समीकरण पर कोई प्रत्याशी बात करते ही नही । बडे-बडे दिग्गज नेता जो अनुसूचित जाति वर्ग के है वे सभी आरक्षित सीट से ही लडने की मंशा जता रहे है और अगर जीत भी गए तो ना ही संसदीय क्षेत्र का भला होगा और ना ही अनुसूचित जाति वर्गो का, कुछ महत्तवपूर्ण बिन्दुओ पर चर्चा करे तो- नकल प्रकरण मे जांजगीर संसदीय क्षेत्र प्रदेश् मे नंबर वन पर है ,, अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति वर्ग के बावजूद रोजगार में पीछे है। ,, शिक्षा में यहां के निवासी बिलासपुर और रायपुर पर निर्भर है
जांजगीर संसदीय क्षेत्र के लिए 42 उम्मीदवार ,क्षेत्र का विकास और आरक्षित वगौ्ं की होड ,मतदाताओं के लिए सोचनीय विषय हो सकती है अगर मतदाता जागरूक हो तो
Tuesday, February 17, 2009
Tuesday, February 3, 2009
ऑस्कर के लिए अक्सर मे ना बदल जाएं
ऑस्कर मिले या ना मिले लेकिन सामाजिक संस्था और सरकार के बचपन को लेकर ऐसे अनेक वादे हुए है तारे जमीं पर उतारे गए और एक नौजवान करोडपति भी बना फिर भी भारत देश की दशा नही सुध्ारी दिखीा दिशा सुधारने की बात ही छोडिएंा मधुर भंडारकर असलियत को पर्दे पर उतारने मे माहिर माने जाते है जो ट्रेफिक सिग्नल मे दिख भी, वही आमिर खान गिने चुने फिल्मों मे अपनी अदाकारी की छाप छोडते है ये सारे मशहूर हस्तियां जिसके सामने ये विषय कोई समस्या ना होकर पैसा बनाने की मशीन है फिर भी वास्तविक्ता यही है आज भी लोग भूखे नंगेऔर सडक पर सोने को मजबूर है शायद इनको ऑस्कर मिलता तो अमीरी गरीबी का भेदभाव कम होता लेकिन अक्सर ऐसा नही होगा मेरे देश मे गरीब गरीब ही रहे तो ठीक है आदिवासी छोटे कपडे पहने तो ठीक, कबिलों देहात गांवो में कोई महिला अर्दनग्न दिख्ो तो ठीक है क्यों कि पैसा बनाते है अगर गरीबी खत्म हो गई तो पैसा कमाने का नया आयडिया कहां से आएंगे
स्लमडॉग मिलेनियर को ऑस्कर एवार्ड मिलने या ना मिलने के पीछे एक बात जरूर सोचनीय है कि अगर ये एवार्ड एक ऐसी फिल्म को मिलती जिससे कि जाति, धर्म, छुआछुत रंगभेद सब मिट जाएं तो शायद हमारे महापुरूषों और अनगित देशवासियों पर भारतीय होने का गर्व सौगुणा और बढ जाएगां ,, स्लमडॉग मिलेनियर फिलम का 11 नामांकन होना अवार्ड मिलने की उम्मीद तो बढाती है लेकिन आजादी के इकसठ् साल बाद भी ऐसे हालातों पर तरस आनी चाहीएं कि रेल्वे स्टेशन पर क्यों भीख दिया जाएं, उस बच्चे को भीख्ा की बजाय अधिकारों के बारे में क्यों नही बताया जाएं, क्यो ना हर व्यक्ति अपने अधिकारों का ख्याल रखकर जिला अधिकारी से सवाल करे की बच्चे आखिर ऐसा क्यो कर रहे है कौन मजबूर कर रहा है इन्हे अपना बचपन बर्बाद करने के लिएा
ऑस्कर नामांकित स्लमडॉग मिलेनियर को मेरी अग्रिम शुभकामनाएं
Sunday, February 1, 2009
क्या होगा हम हिन्दुओं का.....।
बसंत पंचमी पर्व भारत में अपना विशेष महत्व रखता है। क्योंकि इसी दिन से बसंत रितु की शुरूआत होती है। लंबे समय से ज्ञान की देवी सरस्वती मां की पूजा-अर्चना की जाती रही है, जो आज भी चल रही है। जो कि स्कूलों-कॉलेजों में बड़े रूप में मनाए जाते हैं। हिन्दू धर्म में सरस्वती माता को ज्ञान की देवी भी कहा जाता है। हिन्दू होने के नाते मुझे गर्व होने के बजाय ये सवाल मन में है कि आखिर हिन्दू देवी-देवताओं का सम्मान कहां पर हो रहा है।
मेरे मोहल्ले और कॉलेज में अण्डा पेड़ लगाकर पूजा-अर्चना शुरू की गई और तरह-तरह के कार्यक्रमों से दिन को यादगार बनाने की कोशिश भी की गई। हिन्दू धर्म के अनुसार ज्ञान की देवी माता सरस्वती है। लेकिन क्या दूसरे धर्म के लोग भी माता सरस्वती को ज्ञान की देवी मानते हैं। मेरे इस प्रश्न से अच्छे-अच्छे विचारों पर विराम लग सकता है। क्योंकि अगर सभी धर्म के लोग सरस्वती माता को ज्ञान की देवी नहीं मानते। तो फिर मेरे धर्म के लोग सरस्वती माता का अपमान खुशी से क्यों स्वीकार कर रहे हैं। इस मान, सम्मान और अपमान की बात के बीच सार्वजनिक जगहों पर पत्थर रखकर सिंदूर लगाकर पूजना और फिर देवी-देवताओं को मंदिर के बजाय रोड, गंदगी या फिर किसी भी सार्वजनिक स्थानों पर पूजना क्या हिन्दू धर्म के संस्कार हैं। अगर नहीं तो क्यों ऐसे काम हिन्दुवादी विचारधारा वाले कर रहे हैं। क्या सिर्फ पूजा-पाठ, यज्ञ करने से ही धर्म की सर्वोच्च्ाता बढ़ती है।
मेरे विश्वविद्यालय में बसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा और हवन कार्यक्रम आयोजित की गई और सभी छात्रों ने हिस्सेदारी भी निभाई, सिवाय मेरे........... । मेरे पूजा-पाठ में शामिल नहीं होने पर मेरे मित्र तरह-तरह की धारणाएं बनाने लगे। कुछ मित्रों ने मुझे कहा कि क्यों हिन्दू धर्म में रहने का इरादा नहीं है क्या पापी। तो कुछ छात्रों ने आतंकवादी कहकर संबोधित किया। पत्रकारिता के छात्रों के इस कृत्य पर हंसी तो आई लेकिन बसंत पंचमी कीफिकर करके मैं चुप हो गया। कुछ अन्य धर्म के मित्र मेरे साथ लाइब्रेरी में बैठे बोलने लगे कि अरे यार तेरे धर्म में देवी-देवताओं को सार्वजनिक जगह में पूजने का क्या अर्थ, इनका स्थान तो मंदिर में होना चाहिए। कुछ देर तक मैं चुप बैठा लेकिन वास्तव में मुझे अपने धर्म में रहकर अपने ही हिन्दू धर्म के लोगों पर गुस्सा भी आया। चूंकि हिन्दू धर्म पहले से ही वर्ण-व्यवस्था से घिरी हुई है, जिसमें शुद्रों की स्थिति दयनीय है। हिन्दू धर्म में ब्राह्मण वर्ग का श्रेष्ठ होना और धर्म को बदनाम करने की साजिश क्या वास्तव में उच्च वर्णों के हाथ में है।
ब्राह्मणवाद को लेकर मुझे कोई शिकायत नहीं है। शिकायत तो मुझे हिन्दू देवी-देवताओं का सार्वजनिक जगहों में पूजने पर है। हिन्दू धर्म के अलावा किसी भी धर्म के लोग अपने ईश्वर के साथ इतनी ज्यादती नहीं करते सिवाय हिन्दू धर्म के। मार्क्स के विचार कि राष्ट्र के विकास में धर्म अफीम है। इसके बावजूद भी क्या देश में हिन्दू देवी-देवताओं का और हिन्दू धर्म का हित हो पाएगा।
मेरे मोहल्ले और कॉलेज में अण्डा पेड़ लगाकर पूजा-अर्चना शुरू की गई और तरह-तरह के कार्यक्रमों से दिन को यादगार बनाने की कोशिश भी की गई। हिन्दू धर्म के अनुसार ज्ञान की देवी माता सरस्वती है। लेकिन क्या दूसरे धर्म के लोग भी माता सरस्वती को ज्ञान की देवी मानते हैं। मेरे इस प्रश्न से अच्छे-अच्छे विचारों पर विराम लग सकता है। क्योंकि अगर सभी धर्म के लोग सरस्वती माता को ज्ञान की देवी नहीं मानते। तो फिर मेरे धर्म के लोग सरस्वती माता का अपमान खुशी से क्यों स्वीकार कर रहे हैं। इस मान, सम्मान और अपमान की बात के बीच सार्वजनिक जगहों पर पत्थर रखकर सिंदूर लगाकर पूजना और फिर देवी-देवताओं को मंदिर के बजाय रोड, गंदगी या फिर किसी भी सार्वजनिक स्थानों पर पूजना क्या हिन्दू धर्म के संस्कार हैं। अगर नहीं तो क्यों ऐसे काम हिन्दुवादी विचारधारा वाले कर रहे हैं। क्या सिर्फ पूजा-पाठ, यज्ञ करने से ही धर्म की सर्वोच्च्ाता बढ़ती है।
मेरे विश्वविद्यालय में बसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा और हवन कार्यक्रम आयोजित की गई और सभी छात्रों ने हिस्सेदारी भी निभाई, सिवाय मेरे........... । मेरे पूजा-पाठ में शामिल नहीं होने पर मेरे मित्र तरह-तरह की धारणाएं बनाने लगे। कुछ मित्रों ने मुझे कहा कि क्यों हिन्दू धर्म में रहने का इरादा नहीं है क्या पापी। तो कुछ छात्रों ने आतंकवादी कहकर संबोधित किया। पत्रकारिता के छात्रों के इस कृत्य पर हंसी तो आई लेकिन बसंत पंचमी कीफिकर करके मैं चुप हो गया। कुछ अन्य धर्म के मित्र मेरे साथ लाइब्रेरी में बैठे बोलने लगे कि अरे यार तेरे धर्म में देवी-देवताओं को सार्वजनिक जगह में पूजने का क्या अर्थ, इनका स्थान तो मंदिर में होना चाहिए। कुछ देर तक मैं चुप बैठा लेकिन वास्तव में मुझे अपने धर्म में रहकर अपने ही हिन्दू धर्म के लोगों पर गुस्सा भी आया। चूंकि हिन्दू धर्म पहले से ही वर्ण-व्यवस्था से घिरी हुई है, जिसमें शुद्रों की स्थिति दयनीय है। हिन्दू धर्म में ब्राह्मण वर्ग का श्रेष्ठ होना और धर्म को बदनाम करने की साजिश क्या वास्तव में उच्च वर्णों के हाथ में है।
ब्राह्मणवाद को लेकर मुझे कोई शिकायत नहीं है। शिकायत तो मुझे हिन्दू देवी-देवताओं का सार्वजनिक जगहों में पूजने पर है। हिन्दू धर्म के अलावा किसी भी धर्म के लोग अपने ईश्वर के साथ इतनी ज्यादती नहीं करते सिवाय हिन्दू धर्म के। मार्क्स के विचार कि राष्ट्र के विकास में धर्म अफीम है। इसके बावजूद भी क्या देश में हिन्दू देवी-देवताओं का और हिन्दू धर्म का हित हो पाएगा।
Monday, January 26, 2009
पूर्ण्अपमान दिवस
26 जनवरी एक ऐसा पर्व जिसका इंतजार हर देशवासियों और खासकर देशभक्तों को आस रहती है मेरी प़त्रकारिता और कुछ अलग करने की उम्मीद ने मुझे एक बार फिर अपने अपने अस्तित्व की ओर झाकने को मजबूर किया है उच्च शिक्षा प्राप्त मेरी शिक्षा देश के काम नही आई. शिक्षा का महत्तव बताने वाले शिक्ष्ाक मुकदर्शक बन सभी आयोजनो का मजा लेते रहेा पता नही चला की 26 जनवरी की सुबह देश के महत्तव को जानने के लिए था या संविधान के अनुसार अपने कार्य को अपनी जिम्मेदारी के साथ पूर्ण करने का

गली मोहल्ले मे तिरंगा फहराने का इंतजार करते लोग और खुशी के बीच मेरी चुप्पी ना जाने क्यों मन ही मन चुभ रही थी तिरंगे के नीचे महापुरूषों की दुर्दशा अपने अपमान से कम नही इन सब मे भी चौकाने वाली बात रही गांधीमय ध्वजारोहण मै मेरी भावनाओं के साथ या किसी की भावनाओं के साथ खिलवाड करना नही चाहता लेकिन मेरी बेबाकी जायज है क्यों कि संविधान के निर्माता डा; भीमराव अम्बेडकर फिर अछूते दिखें ृृृृृ आजादी से पूर्व अपने आजादी की परवाह किए बिना अछूतों के हक की लडाई लडने वाले मेरे आदर्श महापुरूष को उन्ही लोगो ने अछूत बना दिया जो गर्व से इस महापुरूष के च्रयास से उच्च पदो पर आसीन है। गली मोहल्ले कालोनी मे तो गांधी मगर मेरे देश में क्या बाबा साहब के लिए नही है. मै हमेशा तो ऐसी मांगे नही करता लेकिन क्या बाबा साहेब को पूजा जाना या उनके कार्यों की बखान करना अछूतों की श्रेणी मे खडा करता है मुझे मेरी जिम्मेदारीयों का एहसास भी है फिर भी मै कुछ नही कर सकता
मै दावा के साथ कह सकता हू की मेरे देश मे छूआछूत खत्म नही हुआ है और छूआछूत खत्म करना कोई नही चाहता क्यो की मान-सम्मान और प्रतिष्ठा इसी सें बनी रहती है इन सबके बावजूद कोई संविधान के बारे मे कुछ बताना नही चाहता और क्यो बताएं अगर आम लोगो को अपने अधिकारों की जानकारी हो गई और जाग गए तों देश में भ्रष्ट मंत्री अधिकारी आई एस कुलपति नही बनेंगे लेकिन कुछ स्वार्थ के लिए महापुरूषो का अपमान हुआ है खासकर एससी एसटी और ओबीसी वर्ग के उच्च पदस्थ लोगो को शर्म आनी चाहिए जो इन महापरूषों के सम्मान के लायक नही है।

गली मोहल्ले मे तिरंगा फहराने का इंतजार करते लोग और खुशी के बीच मेरी चुप्पी ना जाने क्यों मन ही मन चुभ रही थी तिरंगे के नीचे महापुरूषों की दुर्दशा अपने अपमान से कम नही इन सब मे भी चौकाने वाली बात रही गांधीमय ध्वजारोहण मै मेरी भावनाओं के साथ या किसी की भावनाओं के साथ खिलवाड करना नही चाहता लेकिन मेरी बेबाकी जायज है क्यों कि संविधान के निर्माता डा; भीमराव अम्बेडकर फिर अछूते दिखें ृृृृृ आजादी से पूर्व अपने आजादी की परवाह किए बिना अछूतों के हक की लडाई लडने वाले मेरे आदर्श महापुरूष को उन्ही लोगो ने अछूत बना दिया जो गर्व से इस महापुरूष के च्रयास से उच्च पदो पर आसीन है। गली मोहल्ले कालोनी मे तो गांधी मगर मेरे देश में क्या बाबा साहब के लिए नही है. मै हमेशा तो ऐसी मांगे नही करता लेकिन क्या बाबा साहेब को पूजा जाना या उनके कार्यों की बखान करना अछूतों की श्रेणी मे खडा करता है मुझे मेरी जिम्मेदारीयों का एहसास भी है फिर भी मै कुछ नही कर सकता
मै दावा के साथ कह सकता हू की मेरे देश मे छूआछूत खत्म नही हुआ है और छूआछूत खत्म करना कोई नही चाहता क्यो की मान-सम्मान और प्रतिष्ठा इसी सें बनी रहती है इन सबके बावजूद कोई संविधान के बारे मे कुछ बताना नही चाहता और क्यो बताएं अगर आम लोगो को अपने अधिकारों की जानकारी हो गई और जाग गए तों देश में भ्रष्ट मंत्री अधिकारी आई एस कुलपति नही बनेंगे लेकिन कुछ स्वार्थ के लिए महापुरूषो का अपमान हुआ है खासकर एससी एसटी और ओबीसी वर्ग के उच्च पदस्थ लोगो को शर्म आनी चाहिए जो इन महापरूषों के सम्मान के लायक नही है।
Friday, January 9, 2009
शिक्षा के क्षेत्र में जातिवाद हावी
भारत को लोकतांत्रिक देश की संज्ञा दी गई है लेकिन लोगों का जीवन लोकतांत्रिक देश के अनुकूल नही है यहां हर क्षेत्र में समस्या ही समस्या है लोगों की समस्या के समाधान करने वाले को दबा दिया जाता है और न्याय संगत बाते करने पर आरोप जड़ दिए जाते हैं। ये किसी किताब से पढ़ा हुआ नही है और ना ही किसी के द्वारा बताया गया हैं। ऐसे हालात मुझ पर ही बन चुके हैं या कहे शिक्षा व्यवस्था पर वर्ग विशेष्ा का दबाव है कुशाभाउ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविघालय अपने लक्ष्य से भटक चुका है पत्रकारिता की शिक्षा देने के बजाय (ब्राम्हण) वर्ग विशेष को अच्छे नम्बर दिए जाते है मेरा मक्सद हिन्दू ध
र्म की बुराई करना तो नहीं, लेकिन बेबाक बोलना मेरी बुराई है ये सभी शिक्षक कहते है सेमेस्टर की पढाई परीक्षा का परिणाम आ चुका है जिसका कोई औचित्य नही है पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष भी अधिकतर छात्र-छात्राएं परीक्षा परिणाम को लेकर असंतुष्ट हैं। वहीं इस वर्ष चौंकाने वाले परिणाम सामने आए हैं। उत्तीर्ण परीक्षार्थियों की संख्या 76.92 प्रतिशत रही और अधिकतर छात्रों को पूरक दे दिया गया। लेकिन इन सबमें भी चौकाने वाली बात रही। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के छात्र जीतेन्द्र सोनकर को एक विषय में पूरक दे दिया गया। जोकि निजी टीवी चैनल में संबंधित विषय के अंतर्गत कार्यरत् हैं। जिस विषय में पूरक दिया गया वो है एडिटिंग ग्राफिक्स। जिसे बतौर नॉन लीनियर एडिटर की मुख्य भूमिका में 3 साल का अनुभव है। मीडिया क्षेत्र में अनुभव प्राप्त छात्र को पूरक देना विश्वविद्यालय के लिए एक शर्मनाक बात है और जाहिर है कि परीक्षा परिणाम में त्रुटियां पाई गई है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विभागाध्यक्ष से इस विषय पर बात करने पर आश्वासन के सिवाय कुछ न्याय संगत बातें नहीं मिली।
विभिन्न विषयों के परिणामों को देखें तो चौकाने वाले परिणाम आते हैं जिसमें लगातार 2 सेमेस्टर से प्रथम श्रेणी पर उत्तीर्ण छात्र को इस बार सेकेण्ड दर्जा दिया है। वहीं एम.जे. के छात्र में भी काफी फेरबदल हुए हैं। कुल मिलाकर सभी विषयों में विशेष वर्ग को महत्व दिया गया है। जितने भी छात्र पहले पायदान पर पहुंचे हैं वे सभी ऊंची जाति के हैं। जिनमें अधिकतर शर्मा, मिश्रा, शुक्ला जैसे उपनाम वाले छात्र हैं। वहीं पिछले सेमेस्टर के परिणाम में जाति विशेष को दर्जा नहीं दिया गया था। इस सेमेस्टर के उत्तीर्ण छात्र जो कि अच्छे नंबरों से अच्छे पायदान पर पहुंच चुके हैं। उन छात्रों को अच्छे पायदान पर पहुंचने का अंदाजा तो दूर पूरक आने तक का डर था। उसी डर ने इस तरह की जातिगत नंबरों को महत्व देने के आधार पर विश्वविद्यालय पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।
असंतुष्टों की श्रेणी में ब्राह्मण वर्ग को छोड़ सभी निम्न वर्ग की श्रेणी में आते हैं। एस.टी.,एस.सी. और ओबीसी छात्र-छात्राओं का गुस्सा फूट रहा है। वाकई अगर हालात ऐसे ही बने तो वो दिन दूर नहीं जब हिन्दू खुद आपस में वर्ग विशेष के लिए न्याय पाने हिंसात्मक कदम उठा लेंगे। विश्वविद्यालय में बहुत सारी गतिविधियां ऐसी होती है जो कि जाति के आधार पर जाति में खुद को ऊंचे पायदान पर पहुंचाने की कोशिश रहती है। मेरा मकसद न ही जातिगत भावनाओं में फूट डालना है और न ही जाति के आधार पर भेदभाव करना है। लेकिन अगर बात शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र की हो तो शिक्षा अधिकारी को चुप नहीं बैठना चाहिए क्योंकि राष्ट्रभक्ति में शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान होता है। मेरा स्वयं पूरक आना पता नहीं मेरी पत्रकारिता में कितने आड़े आती है, लेकिन मैं उन पत्रकारों में से नहीं हूं जो प्रथम श्रेणी के आधार पर पत्रकार बनते हैं। अनगिनत लेखकों एवं विद्वानों के मदद से मैं अपनी बेबाकी को समय आने पर ज़रूर प्रस्तुत करूंगा।
विभिन्न विषयों के परिणामों को देखें तो चौकाने वाले परिणाम आते हैं जिसमें लगातार 2 सेमेस्टर से प्रथम श्रेणी पर उत्तीर्ण छात्र को इस बार सेकेण्ड दर्जा दिया है। वहीं एम.जे. के छात्र में भी काफी फेरबदल हुए हैं। कुल मिलाकर सभी विषयों में विशेष वर्ग को महत्व दिया गया है। जितने भी छात्र पहले पायदान पर पहुंचे हैं वे सभी ऊंची जाति के हैं। जिनमें अधिकतर शर्मा, मिश्रा, शुक्ला जैसे उपनाम वाले छात्र हैं। वहीं पिछले सेमेस्टर के परिणाम में जाति विशेष को दर्जा नहीं दिया गया था। इस सेमेस्टर के उत्तीर्ण छात्र जो कि अच्छे नंबरों से अच्छे पायदान पर पहुंच चुके हैं। उन छात्रों को अच्छे पायदान पर पहुंचने का अंदाजा तो दूर पूरक आने तक का डर था। उसी डर ने इस तरह की जातिगत नंबरों को महत्व देने के आधार पर विश्वविद्यालय पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।
असंतुष्टों की श्रेणी में ब्राह्मण वर्ग को छोड़ सभी निम्न वर्ग की श्रेणी में आते हैं। एस.टी.,एस.सी. और ओबीसी छात्र-छात्राओं का गुस्सा फूट रहा है। वाकई अगर हालात ऐसे ही बने तो वो दिन दूर नहीं जब हिन्दू खुद आपस में वर्ग विशेष के लिए न्याय पाने हिंसात्मक कदम उठा लेंगे। विश्वविद्यालय में बहुत सारी गतिविधियां ऐसी होती है जो कि जाति के आधार पर जाति में खुद को ऊंचे पायदान पर पहुंचाने की कोशिश रहती है। मेरा मकसद न ही जातिगत भावनाओं में फूट डालना है और न ही जाति के आधार पर भेदभाव करना है। लेकिन अगर बात शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र की हो तो शिक्षा अधिकारी को चुप नहीं बैठना चाहिए क्योंकि राष्ट्रभक्ति में शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान होता है। मेरा स्वयं पूरक आना पता नहीं मेरी पत्रकारिता में कितने आड़े आती है, लेकिन मैं उन पत्रकारों में से नहीं हूं जो प्रथम श्रेणी के आधार पर पत्रकार बनते हैं। अनगिनत लेखकों एवं विद्वानों के मदद से मैं अपनी बेबाकी को समय आने पर ज़रूर प्रस्तुत करूंगा।
Wednesday, January 7, 2009
ताराचंद छत्तीसगढिया बनाम प्रेमप्रकाश बिहारी
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में भाजपा के दिग्गजों की हार से आलाकमान को कार्यवाही करने के लिए मजबूर होना पड़ा। भिलाई विधानसभा से पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमप्रकाश पाण्डे को हराने के लिए भाजपा सांसद ताराचंद साहू पर कार्यवाही कर उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। पार्टी से निष्कासित होने के बाद भाजपा सांसद ताराचंद साहू के तेवर नरम नहीं पड़े बल्कि और ज्यादा गर्म हो
गए हैं। जो बात भिलाई तक सीमित थी। अब निष्कासन के पश्चात पूरे प्रदेश में फैल गई कि छत्तीसगढि़यों की अस्मिता को समझने के लिए छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी प्रत्याशी और जनता का प्रिय होना ज़रूरी है।
मुद्दा वही पुराना है। जब महाराष्ट्र में बिहारियों पर लाठी बरस रहे थे। तो वहीं छत्तीसगढ़ में भी अस्मिता के लिए सांसद ताराचंद साहू और उनके समर्थकों ने भिलाई के बिहारी नेता (पूर्व विधानसभा अध्यक्ष) प्रेमप्रकाश पाण्डे के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और देखते ही देखते बात मारपीट तक पहुंच गई है। जो कि आज तक चल रही है। छत्तीसगढ़ प्रदेश एक औद्योगिक क्षेत्र है। जहां अधिकतर रोजगार बिहारियों को और दक्षिण भारतीयों को मिला है। जहां भिलाई की कहें तो छोटा बिहार के नाम से भी जाना जाता है। ये मुद्दा क्षेत्रवाद का नहीं है, लेकिन स्थानीय निवासियों को हीन-भावना से देखना और बिहार के लोगों को भिलाई में रोजगार दिलाने जैसे कार्य को लंबे समय से प्रेमप्रकाश पाण्डे करते आ रहे हैं। छत्तीसगढियों को डरा-धमकाकर अपने रिश्तेदारों, पहचानवालों को इस्पात संयंत्र में रोजगार दिलाने जैसी बात लंबे समय से चल रहा है। चूंकि पाण्डे जी इस्पात संयंत्र के अध्यक्ष भी थे जिनकी पहचान वरिष्ठ अधिकारियों से भी थी। जो छत्तीसगढियों के शोषण के लिए बहुत था। समय बीतने के साथ अधिकतर बिहारियों का दमन भिलाई के छत्तीसगढियों के खिलाफ बढ़ता गया। महाराष्ट्र की घटना ने छत्तीसगढियों की नींद उड़ा दी और अपने हक के लिए भिलाई निवासी शक्ति प्रदर्शन (मारपीट) करने से नहीं चूके।
राजठाकरे की भूमिका ने भले ही महाराष्ट्र में आग लगाई है लेकिन छत्तीसगढ़ में भी इसका असर देखा गया और छत्तीसगढिया बिहारियों के वर्चस्व ने लड़ाई के लिए विवश किया। मुझे ज़्यादा जानकारी बिहारियों के बारे में नहीं था। लेकिन भिलाई जाने पर पता चला कि छत्तीसगढ़ के मूल निवासी झोपड़ी में और बिहारी बड़ी मंजिलों में रहते हैं इसका मुख्य कारण बिहारियों की असलियत सामने लाती है। मगर सोचने के लिए प्रेरित करने वाला वाक्या ये है कि क्या पूरे प्रदेश में बिहारी ऐसे ही हैं या फिर बिहार के लोग ही ऐसा करते हैं। पूरे प्रदेश का तो पता नहीं लेकिन फिलहाल सांसद और पूर्व विधायक के बीच छत्तीसगढियों और बिहारियों के वर्चस्व की लड़ाई भाजपा ने सांसद ताराचंद साहू के निष्कासन से शुरू कर दिया है। और आगे चलकर इसका परिणाम भी मिल सकता है। लेकिन बिहारियों का भविष्य छत्तीसगढ़ में ? ? ?
मुद्दा वही पुराना है। जब महाराष्ट्र में बिहारियों पर लाठी बरस रहे थे। तो वहीं छत्तीसगढ़ में भी अस्मिता के लिए सांसद ताराचंद साहू और उनके समर्थकों ने भिलाई के बिहारी नेता (पूर्व विधानसभा अध्यक्ष) प्रेमप्रकाश पाण्डे के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और देखते ही देखते बात मारपीट तक पहुंच गई है। जो कि आज तक चल रही है। छत्तीसगढ़ प्रदेश एक औद्योगिक क्षेत्र है। जहां अधिकतर रोजगार बिहारियों को और दक्षिण भारतीयों को मिला है। जहां भिलाई की कहें तो छोटा बिहार के नाम से भी जाना जाता है। ये मुद्दा क्षेत्रवाद का नहीं है, लेकिन स्थानीय निवासियों को हीन-भावना से देखना और बिहार के लोगों को भिलाई में रोजगार दिलाने जैसे कार्य को लंबे समय से प्रेमप्रकाश पाण्डे करते आ रहे हैं। छत्तीसगढियों को डरा-धमकाकर अपने रिश्तेदारों, पहचानवालों को इस्पात संयंत्र में रोजगार दिलाने जैसी बात लंबे समय से चल रहा है। चूंकि पाण्डे जी इस्पात संयंत्र के अध्यक्ष भी थे जिनकी पहचान वरिष्ठ अधिकारियों से भी थी। जो छत्तीसगढियों के शोषण के लिए बहुत था। समय बीतने के साथ अधिकतर बिहारियों का दमन भिलाई के छत्तीसगढियों के खिलाफ बढ़ता गया। महाराष्ट्र की घटना ने छत्तीसगढियों की नींद उड़ा दी और अपने हक के लिए भिलाई निवासी शक्ति प्रदर्शन (मारपीट) करने से नहीं चूके।
राजठाकरे की भूमिका ने भले ही महाराष्ट्र में आग लगाई है लेकिन छत्तीसगढ़ में भी इसका असर देखा गया और छत्तीसगढिया बिहारियों के वर्चस्व ने लड़ाई के लिए विवश किया। मुझे ज़्यादा जानकारी बिहारियों के बारे में नहीं था। लेकिन भिलाई जाने पर पता चला कि छत्तीसगढ़ के मूल निवासी झोपड़ी में और बिहारी बड़ी मंजिलों में रहते हैं इसका मुख्य कारण बिहारियों की असलियत सामने लाती है। मगर सोचने के लिए प्रेरित करने वाला वाक्या ये है कि क्या पूरे प्रदेश में बिहारी ऐसे ही हैं या फिर बिहार के लोग ही ऐसा करते हैं। पूरे प्रदेश का तो पता नहीं लेकिन फिलहाल सांसद और पूर्व विधायक के बीच छत्तीसगढियों और बिहारियों के वर्चस्व की लड़ाई भाजपा ने सांसद ताराचंद साहू के निष्कासन से शुरू कर दिया है। और आगे चलकर इसका परिणाम भी मिल सकता है। लेकिन बिहारियों का भविष्य छत्तीसगढ़ में ? ? ?
Thursday, December 4, 2008
पाकिस्तान राष्ट्रध्वज में लगी आग
देश का सबसे बड़ा आतंकी हमला भले ही मुंबई में हुआ हो। लेकिन हर एक देश वासियों में उस आतंकी हमले को लेकर नाराज़गी इस कदर है कि अपनी परवाह किए बगैर ही आतंक के सरताज पाकिस्तान को आतंकी संगठनों का हवाला देकर नारेबाजी की गई। लेकिन बात आतंकी हमलों तक ही सीमित नहीं रही और न ही मुंबई तक। हर एक देशवासी चाहे वो अमीर हो या गरीब। हर कोई आतंकी हमले पर
मुंहतोड़ जवाब देना चाहता है।
राजधनी रायपुर में छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी द्वारा पाकिस्तान का झंडा जलाया गया। प्रदेश कांग्रेस कमेटी का ये गुस्सा एक हद तक सही भी है, लेकिन कुछ आतंकियों के कारण पाकिस्तान के राष्ट्रध्वज का अपमान करना भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए पता नहीं क्या संदेश देना चाहती है।
आतंक के खिलाफ आतंक के रूप में जवाब देना करोड़ों देशवासियों को हिंसा की ओर भेज सकती है और हिंसात्मक रूप शांति का
प्रतीक कभी नहीं होता। आतंकियों का जवाब देने के लिए हमारे देश के फोर्स, कमाण्डो, बटालियन पर देशवासियों को भरोसा करना होगा। जो अपनी जान परवाह किए बगैर देश की रक्षा के लिए जान न्यौछावर कर देते हैं। मैं सलाम करता हूं ऐसे वीर शहीदों को जो देश में शांति और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर देते हैं।
राजधनी रायपुर में छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी द्वारा पाकिस्तान का झंडा जलाया गया। प्रदेश कांग्रेस कमेटी का ये गुस्सा एक हद तक सही भी है, लेकिन कुछ आतंकियों के कारण पाकिस्तान के राष्ट्रध्वज का अपमान करना भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए पता नहीं क्या संदेश देना चाहती है।
आतंक के खिलाफ आतंक के रूप में जवाब देना करोड़ों देशवासियों को हिंसा की ओर भेज सकती है और हिंसात्मक रूप शांति का
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